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Thursday, 16 February 2023

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?

 रुद्राभिषेक_से_क्या_क्या_लाभ_मिलता_है_?


शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात् आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का प्रयोग करना चाहिए इसका उसका उल्लेख शिव पुराण में किया गया है। इसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक करायें तो आपको निश्चित ही मनोवांछित लाभ मिलेगा।





श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा च यांगना।

ज्वरप्रकोपशांत्यर्थं जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च सदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेत्छिवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।


अर्थ

1.जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।

2.कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलता है।

3.दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

4.गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —   लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

5.मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि होती है।

6.तीर्थ जल से अभिषेक करने पर —मोक्ष की प्राप्ति होती है।

7.इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —बीमारी नष्ट होती है ।

8.दूध से अभिषेक करने से   —  पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण होती हैं।

9.गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।

10.शर्करा मिश्रित दूध से अभिषेक करने से — सद्बुद्धि मिलती है।

11.घी से अभिषेक करने से — वंश का विस्तार होता है।

12.सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।

13.शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करने से   — पाप क्षय होता है।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।


नोट - महाशिवरात्रि में रुद्राभिषेक कराने हेतु हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान से शीघ्र सम्पर्क करें।


ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

संस्थापक एवं महासचिव

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

शिवरात्रि में प्रहर पूजा

 शिवरात्रि में प्रहर पूजा


प्रदोष में चार पहर की पूजा के लिए समय गणना -


18 फरवरी 2023 को फाल्गुन कृष्ण प्रदोष शिवरात्रि व्रत है। इस दिन कई लोग शिवजी की प्रहर पूजा करते हैं इसे यामपूजा भी कहा जाता है । रात्रि के चारों प्रहर भगवान शिवजी का अपने कामनीय द्रव्यानुकुल पदार्थ से शिवजी का भव्य रुद्राभिषेक और पूजन किया जाता है। शिव पार्वती का श्रृंगार किया जाता है।




शिवरात्रि में प्रहर पूजा


पारण चौथे प्रहर के अन्त में करें, प्रहर पूजन के पश्चात् आरती करके प्रसाद ग्रहण करें,और पारण करें अथवा प्रातः सूर्योदय के पश्चात पारण करें।

शिवरात्रि में रात्रि जागरण और प्रहर पूजन का सर्वाधिक महत्व है।

अब प्रश्न है कि हम सही प्रहर की गणना कैसे करें ताकि चारों प्रहर का ससमय पूजन किया जा सके। तो इसके लिए मैं बहुत सरल सूत्र आपको दे रहा हूँ-

1. सूर्यास्त-सूर्योदय=दिनमान

*समय 24घन्टे में लेना है

2. 24 घन्टे-दिनमान=रात्रिमान

3. रात्रिमान/4= प्रहर काल

4. सूर्यास्त+प्रहर काल= प्रथम प्रहर

5. प्रथम प्रहर+प्रहर काल= द्वितीय प्रहर

6. द्वितीय प्रहर+प्रहर काल= तृतीय प्रहर

7. तृतीय प्रहर+प्रहर काल= चतुर्थ प्रहर


उदाहरण-

दिल्ली का सूर्योदय- 6:58

दिल्ली का सूर्यास्त- 18:12

सूत्रानुसार-

1. 18:12 - 6:58 = 11:14

2. 24:00-11:14 = 12:46

3. 12:46/4 = 03:11

4. 18:12 + 3:11 = 21:43 तक प्रथम प्रहर

5. 21:43 + 3:11 = 24:34 तक द्वितीय प्रहर

6. 24:34 + 3:11 = 27:45 (रात 03:45) तक तृतीय प्रहर

7. 27:45 + 3:11 = 30:56 (सुबह 6:56) तक चतुर्थ प्रहर


इस प्रकार अपने स्थान के सूर्योदय-सूर्यास्त के हिसाब से गणना करके या मोटे तौर पर दिल्ली की गणना के आधार पर आप प्रहर पूजा कर सकते हैं।

वैसे तो सूर्योदय सूर्यास्त सभी पंचागों में दिया रहता है। बहुत सारे पंचांग ऐप भी हैं जिनसे सूर्योदय सूर्यास्त का ज्ञान हो जाता है। फिर भी अपने स्थान का सूर्योदय जानने के लिए आप इस website का भी प्रयोग कर सकते हैं।

https://www.timeanddate.com/sun/


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

संस्थापक एवं महासचिव

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Friday, 30 August 2019

हरितालिका(तीज) व्रत निर्णय



तीज (हरितालिका) व्रत निर्णय
     तीज को हम सब हरितालिका व्रत के रूप में जानते हैं । यह पर्व भारतीय संस्कृति के आधारभूत मातृशक्ति के द्वारा संपादित किया जाता है । हरितालिका व्रत इस वर्ष कुछ पंचांगकारों ने 1 सितंबर 2019 रविवार को पालन करने का निर्देश किया है, जबकि कुछ पंचांगकार 2 सितंबर 2019 सोमवार को संपन्न करने का निर्देश देते हैं ।
     वस्तुतः यह व्रत भाद्रपद मास के  शुक्ल पक्ष के  तृतीय और हस्त नक्षत्र के संयोग के दिन  संपन्न किया जाता है । यह संयोग  प्रदोष काल में हो  तो उत्तम माना जाता है।  इस वर्ष  समग्र दिक्सिद्ध पंचांगकारों ने 1 सितम्बर को व्रत पालन करने का निर्देश दिए हैं। फिरभी जनमानस को संशय होना स्वाभाविक है। हरितालिका व्रत के निर्णय के लिए एक श्लोक सर्वजन विदित है कि:- भाद्रे मासि सिते पक्षे तृतीया हस्तसंयुता। तदनुष्ठानमात्रेण सर्वपापै: प्रमुच्यते ।। यह सिद्धान्त वचन 1 को ही दिखाई दे रहा है।
इस व्रत को 1 सितम्बर 2019 रविवार को पालन करने के पक्ष में मत :-
        1. तृतीया तिथि और हस्तनक्षत्र का संयोग प्रदोष काल में रविवार को ही प्राप्त हो रहा है ।
        2. इस पर्व का पूजनोत्सव सायं काल में सम्पन्न किया जाता है। अतः सायंकाल में तृतीया हस्त का संयोग रविवार को बन रहा है।
       3. ज्योतिष शास्त्र में प्रत्यक्ष प्रमाण की सर्वाधिक मान्यता है। प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिनौ ।। अतः समस्त दृक्सिद्ध पंचांग समग्र भारत में एक तन्त्र से 1 सितम्बर को हरितालिका व्रत पालन करने का निर्देश दे रहे हैं जब कि कुछ पंचाग 2 सितम्बर 2019 सोमवार को करने के पक्ष में हैं।
      यदि सोमवार को यह व्रत किया जाए तो व्रत करने से पूर्व माताएं कुछ फलाहार तथा जल सेवन  के अनन्तर स्नानादि करके व्रत प्रारम्भ करती हैं जो तृतीया तिथि में होगा। भारत की धर्मपरायण मातायें जो तृतीया में जल तक ग्रहण नहीं करतीं क्या वो तृतीया तिथि में फलाहार ग्रहण कर सकती है ?
     निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा रहा है कि इस व्रत को 1 सितम्बर 2019 रविवार को ही सम्पन्न करना चाहिए।


।। हरि: ॐ।।
प्रो.मदनमोहनपाठक
आचार्य एवं अध्यक्ष ज्योतिषविभाग
सम्पादक:- श्रीजगन्नाथपञ्चाङ्ग
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, लखनऊ परिसर,
गोमतीनगर लखनऊ उ.प्र.

Wednesday, 3 April 2019

चैत्र नवरात्र में कलश स्थापना मुहूर्त

इस वर्ष चैत्र शुल्क प्रतिपदा को रात्रि 9:47 बजे तक वैधृति योग होने से कलश स्थापना के लिए शुभमुहूर्तों की कमी रहेगी।
कहीं कहीं पर विवरण प्राप्त होता है कि यदि चैत्र शुल्क प्रतिपदा सम्पूर्ण रुप से वैधृति योग या चित्रा नक्षत्र से दषित हो तो इनके पूर्वार्ध भाग को छोड़कर कलशस्थापना करनी चाहिए।
यथा-
प्रतिपदाद्यषोड़शनाड़ीनिषेधः
चित्रावैधृतिनिषेधश्च उक्त कालानुरोधेन सति सम्भवे पालनीयः।


* हाँलाकि यह नियम शारदीय नवरात्री प्रसंग में प्राप्त होता है, लेकिन परम्परानुसार इसका विचार चैत्र नवरात्र में भी किया जाता है।

अभिजीत मुहूर्त में कलशस्थापना का बहुत ज्यादा महत्व है, इस वर्ष वैधृति योग व्याप्ति.के कारण अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।
वाराणसी में अभिजीत मुहूर्त का समय- 
11:36am से 12:36pm तक 1 घण्टे के लिए है।
वाराणसी में राहुकाल का समय-
8:53am से 10:27am तक है।


बहुत विशेष परिस्थिति में राहुकाल को छोड़कर शुभ चौघड़िया देखकर कलश स्थापना कर लेनी चाहिए, ऐसा विद्वानों का अभिमत है।

वाराणसी में शुभ चौघड़िया-
शुभ- 7:20am से 8:53am
चाल- 12:01pm से 13:34pm
लाभ- 13:34pm से 15:08pm
अमृत- 15:08pm से 16:42pm

© पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"
   B.H.U., वाराणसी।

जानिए क्या है सनातनीय नववर्ष का महत्त्व


आप सभी लोगों को सनातनीय नववर्ष 2076 की बहुत बहुत मंगलकामना....

सनातनीय नववर्ष आदि काल से चैत्रशुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता रहा है। वैदिशिक प्रभाव में आकर वर्तमान भारतीय पीढ़ी 1 जनवरी को ही अपना नववर्ष समझती है । परन्तु हमें यह बात अवश्य ध्यान रखनी चाहिए कि जो अपना इतिहास भूला देता है उसका नाश निश्चित है। अपनी संस्कृति, संस्कार, परम्परा, धर्म, व्यवस्था आदि हमारे पूर्वजों की थाती हैं, धरोहर हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम इसे निभाएँ, इसे जीवित रखें और अपनी पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपनी भूमिका पूरी करें।

चैत्रशुक्ल प्रतिपदा नववर्ष के वैशिष्ट्य-

1. ब्रह्माजी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही सृष्ट्यारंभ किया था।
2. यह दिन सृष्टि, कल्प और युग के आरम्भ की दिन है।
3.भगवान विष्णु का प्रथम अवतार भी इसी दिन माना जाता है।
4. राजा विक्रमादित्य ने अपना संवत प्रवर्तन इसी दिन से किया था।
5. वासन्तिक नवरात्र का आरम्भ इसी दिन से होता है।
6. हमारे परम आराध्य भगवान श्रीरामचन्द्र जी का जन्म चैत्र मास में ही हुआ है।
7. इस समय पूरी प्रकृति लहलहाती, जगमगाती है।
8. वर्ष के राजा व सभासदों का निर्धारण इसी दिन के वार से होता है।
9. हम परंपरागत रुप से इस त्यौहार को मनाते ही हैं। साल संवत काट कर होली खेल कर पूर्व वर्ष की विदाई करते हैं, और नवरात्र व्रत रामनवमी पूजन के साथ नए वर्ष का शुभारम्भ करते हैं।
10. चैत्र मास को मधु मास भी कहा जाता है, इस समय मौसम भी समशीतोष्ण रहता है।
11. चैत्रशुक्लप्रतिपदा उत्तर भारत में नववर्ष के नाम से, दक्षिण भारत में गुड़ी-पड़वा के नाम से और सिन्धक्षेत्र में श्रीझूलेलाल जयन्ती के नाम से मनाया जाता है।

इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात् सनातन नववर्ष 6 अप्रैल 2019 को है। इसी दिन विक्रम संवत 2076 प्रारंभ होगा | इस वर्ष पूरे वर्षभर परिधावी संवत्सर रहेगा।
इस वर्ष राजा-शनि, मंत्री-सूर्य, सस्येश-बुध हैं। राजा व मन्त्री के परस्पर विरोधीग्रह होने से समाज व शासन में परस्पर तारम्यता व सामंजस्य का अभाव परिलक्षित होगा। बहुत से मायनों में यह वर्ष निर्णायक साबित होगा।

इस दिन क्या करें???
1. आज के दिन संहिता ज्यौतिष के विद्वान  वर्षा की मात्रा अल्पवृष्टि, अनावृष्टि आदि जानने के लिए वायुपरीक्षण करते हैं।

2. आयुर्वेद के विद्वान कुछ महत्वपूर्ण औषधियों के पूजन, संग्रहण व निर्माणारम्भ का कार्य करते हैं।

3. मत्स्यपुराण में कहा गया है, चैत्रमास में मधु रहित दुध-दही-गुड़-घी का मिश्रण, वस्त्र, सुवर्ण आदि से गौरी माता की प्रसन्नता के लिए जो पत्नी सहित ब्राह्मण का पूजन करता है, वह भवानी के लोक को प्राप्त करता है। यह व्रत गौरी व्रत कहलाता है। यथा-

वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैर्युतम्,
दद्याद्वस्त्राणि सूक्ष्माणि सर्ववर्णयुतानि च ।
संपूज्य विप्रमिथुनं गौरी में प्रियतामिती,
एतद् गौरीव्रतं नाम भवानी लोकदायकम् ।।


4. भविष्योत्तर पुराण के अनुसार चैत्र मास में जो व्यक्ति तीन दिनों तक केवल रात्रि को भोजन करते हुए नक्तव्रत करके चौथे दिन किसी नदि में स्नान करके पाँच दूध देने वाली बकरियों का दान किसी गरीब परिवार को करे तो वह जीवन के इस आवागमन से मुक्त हो जाता है। यथा-

चैत्रे त्रिरात्रं नक्ताशी नद्यां स्नात्वा ददाति यः,
अजाः पञ्च पयस्विन्यो दरिद्राय कुटुम्बिने।
न जायते पुनरसौ जीवलोके कदाचन ।।


5. वामन पुराण में बताया गया है कि चैत्रमास में भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को वस्त्र और शय्या का दान करना चाहिए। यथा-

चैत्रे मासि विचित्राणि शयनान्यशनानि च।
विष्णोः प्रीत्यर्थमेतानि देयानि ब्राह्मणेश्वथ ।।


6.चैत्र शुक्ल पक्ष में 15 दिनों तक नीम की गोलियों का सेवन करने वाला व्यक्ति वर्षभर सभी रोगों से मुक्त रहता है।

7. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन तैलाभ्यंग(शरीर में तेल मलकर) स्नान करना चाहिए । वृद्ध वशिष्ठ ने कहा है कि जो इस दिन तैलाभ्यङ्ग स्नान नहीं करता वह नरक को जाता है। यथा-

वत्सरादौ वसन्तादौ बलिराज्ये तथैव च।
तैलाभ्यङ्गमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते ।।

8. इस दिन पञ्चाङ्ग श्रवण का विशेष फल प्राप्त होता है ।

9. आज के दिन अपने अपने घरों में ध्वजारोपण(झंण्ड़ा लगाना) और वर्षपति का पूजन किया जाता है।

10. मुख्य रुप से इस दिन तीर्थ या नदिक्षेत्र में तैलाभ्यंग स्नान, दान आदि करना चाहिए। अपने माता-पिता, गुुरुजन व पितरों व ब्राह्मणों का आशीर्वाद लेना चाहिए। सूर्य भगवान को अर्ध्य और सूर्यरश्मि स्नान करना चाहिए। पक्वान्न खाना चाहिए । पंचांग फल का श्रवण करना चाहिए। अपने घरों की साफ-सफाई करके वन्दनवार लगाना चाहिए। ध्वजारोपण व वर्षपति का पूजन करना चाहिए। अपने मित्रों व परिजनों से पुराने गिले शिकवे भुलाकर नववर्ष की बधाई देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए मेल मिलाप करना चाहिए।

11. आज से ही नवरात्र व्रत का भी आरम्भ होता है, इसके अन्तर्गत लोग कलशस्थापना पूर्वक दुर्गापाठ या रामचरितमानस का पाठ अपने घरों में कराते हैं ।

12. चैत्रमास की तृतीया और पूर्णिमा तिथियाँ  मन्वादि तिथियाँ कही गई है, इस दिन पिण्ड़रहित श्राद्ध व तर्पण का बहुत महत्व है ।
मत्स्यपुराण में कहा गया है कि मन्वादि युगादि तिथियों में विधिपूर्वक श्राद्ध करने से दो हजार वर्षों तक पितरों की तृप्ति होती है। यथा-

कृतं श्राद्धं विधानेन मन्वादिषु युगादिषु।
हायनानि द्विसाहस्रं पितृणां तृप्तिदं भवेत्।।







© पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"
         B.H.U., वाराणसी।
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Monday, 4 March 2019

13 मार्च से होलाष्टक आरम्भ

13 मार्च 2019 से होलाष्टक का आरम्भ हो रहा है | यह होली के आठ दिन पहले से शुरू हो कर होली तक रहने वाला एक अशुभ मुहूर्त है | इसके सन्दर्भ में मुहुर्त चिन्तामणि नामक स्वकृत ग्रन्थ में श्रीराम दैवज्ञ लिखते हैं-

विपाशेरावतीतीरे शुतुद्रूश्च त्रिपुष्करे | विवाहादिशुभे नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम् ||
                                                                                             मु.चि., प्र.१ श्लो.४०
अर्थात- विपाशा (व्यास), इरावती(रावी), शुतुद्रू(सतलुज), नदियों के तीरप्रदेशों में तथा त्रिपुष्कर (अजमेर राजस्थान) क्षेत्रों में होलिका से आठ दिन पहले(अर्थात् फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यन्त) विवाह आदि शुभ कार्य निन्दित हैं | इसे "होलाष्टक" के नाम से जाना जाता है |

ये नदियाँ पंजाब प्रान्त और हिमाचल की हैं | अतः पंजाब, हिमाचल और राजस्थान आदि में होलाष्टक के दौरान शुभकार्य वर्जित है | बड़ी नदियों के दोनों ओर योजन पर्यन्त तट कहा गया है,अतः विशेष सावधानी के लिए श्लोकोक्त स्थानों के सीमावर्ती स्थानों में भी होलाष्टक के दौरान शुभ कर्म वर्जित कर सकते हैं | होलाष्टक के दौरान शुभ कार्यों की वर्जनियता सार्वदेशिक नहीं है, फिर भी आजकल समूचे उत्तर भारतीय क्षेत्र में होलाष्टक माना जाता है |
होली के बाद भी 15 दिन संवत्सर काअंतिम पक्ष होने से शुभ कर्मों के लिए वर्जित हैं |
इस दौरान मुख्यरूप से विवाह, उपनयन, मुंडन, अन्नप्राशन, गृहनिर्माण, गृहप्रवेश और किसी बड़े कार्य का शुभारम्भ नहीं करना चाहिये |

- पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"
   B.H.U., वाराणसी |


Friday, 1 March 2019

महाशिवरात्रि में बन रहा है अद्भुत संयोग




इस वर्ष महाशिवरात्रि में बहुत ही अद्भुद संयोग बन रहे हैं | किसी भी पर्व को विशेष बनाती है उसकी दो योग्यताएं-
1) धर्मशास्त्रीय नियमानुसार पर्व की उपस्थिति
2)और पंचांग शुद्धि |
           धर्मशास्त्र के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष के चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है, निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी शिवरात्रि पूजन के लिए विशेष रूप से प्रशस्त है | इस सन्दर्भ में मैंने अपने पिछले लेख "महाशिवरात्रि व्रत निर्णय" में विस्तार से चर्चा की है |
इस वर्ष निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी होने और एक ही दिन निशीथ व्याप्ति होने से निर्विवाद रूप से 4 मार्च को शिवरात्रि मनाई जाएगी|  इस प्रकार इस वर्ष की शिवरात्रि विशिष्ट होने की पहली योग्यता को पूरी तरह से प्राप्त कर रही है |
अब आइये दूसरी योग्यता पर विचार करते हैं, दूसरी  योग्यता है पंचांग शुद्धि | तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण को संयुक्त रूप से पंचांग कहा जाता है |

तिथि शुद्धि- सूर्योदय के समय चतुर्दशी के प्राप्त न होने से तिथि शुद्धि नहीं हो पा रही है | लेकिन निशीथ व्यापिनी की योग्यता को पूर्ण करने के कारण यह दोष गौण हो रहा है |

वार शुद्धि- चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं इसलिए चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है | शिवरात्रि के दिन शिव जी का वार सोमवार होने से यह अद्भुद संयोग वाली शिवरात्रि शिवभक्तों को विशेष फल प्रदान करने वाली होगी | 

 नक्षत्र शुद्धि-   महाशिवरात्रि के दिन धनिष्ठा नक्षत्र का होना विशिष्ट संयोग बना रहा है | क्योंकि धनिष्ठा धनदायक नक्षत्र है, और इस नक्षत्र को मुहूर्त ग्रंथो में मंत्रसिद्धि और शांतिकर्म के लिए प्रशस्त बताया गया है | इस शिवरात्रि में की गई साधना पूजा भक्तों को सद्य सिद्धि प्रदान करने वाली होगी | धनिष्ठा नक्षत्र का शिवजी के विशेष सम्बन्ध है | आकाश में धनिष्ठा नक्षत्र की आकृति मृदंग की तरह बनती है, बहुत से ज्योतिषी इसे शिव जी का डमरू मानते हैं | धनिष्ठा नक्षत्र के देवता वसु माने गए हैं, भगवान् शिवजी रिश्ते में इन अष्टवसुओं के मौसा लगते हैं | धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी मंगल है जिसके पिता भगवान् शिवजी हैं | अंधकासुर से युद्ध करते समय शिवजी के गिरे हुवे  पसीने से मंगल की उत्पत्ति हुई थी |

योग शुद्धि- इस वर्ष 4 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन शिव योग है | इस महाशिवरात्रि के दिन शिव योग उपस्थित होना बहुत ही श्रेष्ठ संयोग है | 

करण शुद्धि - महाशिवरात्रि के दिन भद्रा करण है | वैसे से भद्रा की कुछ स्थितियों को अशुभ बताया गया है | लेकिन भद्र शब्द का अर्थ होता है कल्याण और इसी भद्र शब्द से भद्रा शब्द बना है | भद्र की कुछ स्थितियां कल्याणकारक भी होती हैं | महाशिवरात्रि के दिन चंद्रमा के मकर राशी में होने से भद्रा का निवास पाताल लोक में हो रहा है और यह भद्रा उस दिन हमसब के लिए शुभ है | सोमवार व शुक्रवार की भद्रा कल्याणी कही जाती है इस प्रकार से भी यह भद्रा कल्याणप्रद है |

इस प्रकार शिवरात्रि के दिन निशीथव्यापिनीचतुर्दशी-सोमवार-धनिष्ठानक्षत्र-शिवयोग-भद्रा करण मिलकर अद्भुद संयोग बना रहे हैं, जो शिवभक्तो को अमोघ फल प्रदान करने में सक्षम होगी |
इस विशेष संयोग का अवश्य आप सबलोग लाभ उठायें और साधना-पूजन-शिवभक्ति-शिवपार्वती श्रृंगार-रुद्राभिषेक रात्रिजागरण आदि आदि अपने अनुकूलता के अनुसार अवश्य करें |


- पं. ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य   

Wednesday, 27 February 2019

शिवरात्रि में प्रहर पूजा

प्रदोष में चार पहर की पूजा के लिए समय गणना-

4 मार्च 2019 को फाल्गुन कृष्ण प्रदोष शिवरात्रि व्रत है। इस दिन कई लोग शिवजी की प्रहर पूजा करते हैं इसे यामपूजा भी कहा जाता है । रात्रि के चारों प्रहर भगवान शिवजी का अपने कामनीय द्रव्यानुकुल पदार्थ से शिवजी का भव्य रुद्राभिषेक और पूजन किया जाता है। शिव पार्वती का श्रृंगार किया जाता है।
पारण चौथे प्रहर के अन्त में करें, प्रहर पूजन के पश्चात् आरती करके प्रसाद ग्रहण करें,और पारण करें। अथवा प्रातः सूर्योदय के बाद पश्चात पारण करें।
शिवरात्रि में रात्रि जागरण और प्रहर पूजन का सर्वाधिक महत्व है।
अब प्रश्न है कि हम सही प्रहर की गणना कैसे करें ताकि चारों प्रहर का ससमय पूजन किया जा सके। तो इसके लिए मैं बहुत सरल सूत्र आपको दे रहा हूँ-

1. सूर्यास्त-सूर्योदय=दिनमान- *समय 24घन्टे में लेना है
2. 24 घन्टे-दिनमान=रात्रिमान
3. रात्रिमान/4= प्रहर काल
4. सूर्यास्त+प्रहर काल= प्रथम प्रहर
5. प्रथम प्रहर+प्रहर काल= द्वितीय प्रहर
6. द्वितीय प्रहर+प्रहर काल= तृतीय प्रहर
7. तृतीय प्रहर+प्रहर काल= चतुर्थ प्रहर

उदाहरण-
वाराणसी का सूर्योदय- 6:13
वाराणसी का सूर्यास्त- 17:47
सूत्रानुसार-
1. 17:47-6:13 = 11:34
2. 24:00-11:34 = 12:26
3. 12:26/4 = 03:06:30
4. 17:47+3:06:30 = 20:53:30 तक प्रथम प्रहर
5. 20:53:30+3:06:30 = 24:00:00 तक द्वितीय प्रहर
6. 24:00:00+3:06:30 = 27:06:30 तक तृतीय प्रहर
7. 27:06:30+3:06:30 = 30:13:00 तक चतुर्थ प्रहर
इस प्रकार अपने स्थान के सूर्योदय-सूर्यास्त के हिसाब से गणना कर या मोटे तौर पर वाराणसी की गणना के आधार पर आप प्रहर पूजा कर सकते हैं।
वैसे तो सूर्योदय सूर्यास्त सभी पंचागों में दिया रहता है। बहुत सारे पंचांग ऐप भी हैं जिनसे सूर्योदय सूर्यास्त का ज्ञान हो जाता है। फिर भी अपने स्थान का सूर्योदय जानने के लिए आप इस website का भी प्रयोग कर सकते हैं।

https://www.timeanddate.com/sun/

- पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"

महाशिवरात्रि व्रत निर्णय

 देवदेव! महादेव! नीलकण्ठ! नमोऽस्तुते,
कर्तुमिच्छाम्यहम् देव शिवरात्रि व्रतं तव ।
तवप्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति,

कामाद्या शत्रवो माम् वै पीड़ां कुर्वन्तु नैव हि।।

अर्थात्- देवदेव! महादेव! नीलकण्ठ आपको नमस्कार है। मैं आपके शिवरात्रि व्रत का अनुष्ठान करना चाहता हूँ। देवेश्वर आपका यह व्रत बिना किसी विघ्न बाधा के पूर्ण हो, और काम क्रोध आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।


महाशिवरात्रि व्रत 4 मार्च को प्रशस्त है।
महाशिवरात्रि जन्माष्टमि आदि व्रत निशीथ व्यापिनि तिथ्याधारित होते हैं। निशीथ व्यापिनि का अर्थ सम्पूर्ण रात्रि में व्याप्त होना नहीं बल्कि रात्रि में व्याप्त होना है। मध्य रात्रि तक व्याप्त तिथि श्रेष्ठ निशीथ व्यापिनि मानी जाती है।
महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण निशीथ व्यापिनि चतुर्दशी को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
आइए इसका गणित समझते हैं-
आंठवें मुहूर्त तक व्याप्त तिथि निशिथ व्यापिनि कहलाती है।
एक मुहूर्त 2 घटी का का होता है, अतः 8 मुहूर्त में 8x2=16घटी,
1 घटी में 0.4 घंटे, अतः 16 घटी में 16x0.4= 6 घंटा 24 मिनट,
4 मार्च को सूर्यास्त 17:49 + 6:24=24:13 मिनट पर रात्रि का आठवाँ मुहूर्त रहेगा। 

चतुर्दशी अगले दिन सायं 06:38 तक है। तो निश्चित ही यह चतुर्दशी निशिथ व्यापिनि है।
निशीथ व्यापिनी शिवरात्रि सर्वप्रथम प्रशस्त है।

भवेद्यत्र त्रयोदश्यां भूतव्याप्ता महानिशा ।
शिवरात्रि व्रतं तत्र कुर्याज्जागरणं तथा ।।


दो दिन यदि निशीथ व्याप्ति हो तो प्रदोषव्याप्ति से निर्णय करना चाहिए।
इसवर्ष 4 मार्च को एक ही निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी के प्राप्त होने से निर्विवाद रूप से पूरे भारतवर्ष में 4 मार्च को ही शिवरात्री मनाई जाएगी।
वैसे चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव होने से प्रतिमास चतुर्दशी तिथि को मासशिवरात्रि व्रत प्राप्त होता है। लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्राप्त होने वाले शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है। क्योंकि पुराणों के अनुसार इसी शिवरात्रि को शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। ईशान संहिता के अनुसार इसी शिवरात्री को करोड़ों सूर्य के समान कान्तिवाले आदिदेव शिवलिङ्ग के रूप में प्रकट हुए थे।
इसदिन व्रत रहकर रात्रिजागरण, नाम संकीर्तन, रुद्राभिषेक, शिवविवाह, शिव-पार्वती श्रृंगार आदि करना चाहिए। इस व्रत में रात्रि जागरण महत्वपूर्ण है।
शास्त्रों में शिवरात्रि की रात्रि को जागरण करने और प्रहर पूजन करने का विधान प्राप्त होता है।
शिवरात्रि को चारों प्रहर शिवपूजन करने वाले भक्त की सभी लौकिक इच्छाओं की पूर्ति भगवान करते हैं, और मृत्यु के उपरांत वह शिवसायुज्य को प्राप्त करता है।


- पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"