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Sunday, 13 August 2023

गुलिक का तिलिस्म - 3


 गुलिक का तिलिस्म

भाग-3


आप इससे पूर्व गुलिक से सम्बंधित मेरे दो पोस्ट पढ़ चुके हैं । जिनमें आपने गुलिक का परिचय प्राप्त किया, गुलिक साधन करना सीखा साथ ही गुलिक के भावफल का विस्तार से अवगाहन किया। मुझे विश्वास है की आपने गुलिक के महत्व को समझा है और बहुत रूचिपूर्वक आप इस तीसरे पोस्ट पर पधार रहे हैं । जो लोग सीधे ही इस पोस्ट में आ गए है उनसे मेरा निवेदन है की कृपया पिछले दोनों पोस्ट पढ़कर ही इस पोस्ट को पढ़ें तो आपके लिए यह पोस्ट ज्यादा लाभकर सिद्ध होगा। मैं उन दोनों पोस्टस् के लिंक आपके साथ साझा कर रहा हूँ । 


गुलिक का तिलिस्म भाग - १

गुलिक का तिलिस्म भाग - २




गुलिक के बारे में अन्य विचार

  • प्रमाण गुलिक - गुलिक स्पष्ट के ठीक 6 राशि आगे स्थित राशि में गुलिक स्पष्ट के समान अंश कला-विकला में भी गुलिक जैसे ही दुष्प्रभावों की स्थिति मानी गयी है। इसे भारतीय ज्योतिष में प्रमाण गुलिक कहा गया है। गुलिक तथा प्रमाण गुलिक दोनों के ही राश्याधीश एवं नवांशपति अपनी-अपनी महादशाओं तथा अंतर्दशाओं में अशुभ एवं मारक फल देने वाले माने गये हैं। 

  • गुलिक जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है वह कितना ही कारक जीवन के लिये होता उसे बेकार कर देता है। ग्रह के कारकत्व को समाप्त करने में गुलिक की मुख्य भूमिका होती है।

  • गुलिक अगर त्याज्य काल में हो तो व्यक्ति राजा के घर में भी पैदा हो फ़िर भी वह दरिद्री होता है।




गुलिक के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल 

  • सूर्य के साथ मिलने से पिता की अल्पायु और पुत्र की बरबादी का कारण होता है आंखों में रोग देता है और अन्धत्व के कारणों मे ले जाता है। 
  • चन्द्रमा के साथ होने पर वह माता का सुख नही देता है और पानी वाले रोग तथा बेकार के छली लोगों से छला जाता है। माता भी अल्पायु होती है। 
  • मंगल के साथ होने से जातक को भाइयों का सुख नही मिलता है और भाई ही उसकी सम्पत्ति का विनास कर देते है,भाई भी अल्पायु के होते हैं। 
  • बुध के साथ होने से जातक को दौरे पडने की बीमारी देता है और पागल पन की बीमारी भी देता है। जातक लगातार बोलने का आदी होता है,और उसकी बडे भाई की पत्नी या पति के बडे भाई से सम्बन्ध बना होता है जिससे अवैद्य सन्तान का पैदा होना और पितृ दोष की उत्पत्ति का कारण भी माना जाता है। 
  • गुरु के साथ धर्म से अलग होना शिक्षा का पूरा नही होना। 
  • शुक्र के साथ होना बहु स्त्री या बहु पुरुष का भोगी,अधिकतर नीच स्त्रियों का समागम करना या नीच पुरुषों के साथ कामसुख की प्राप्ति करना माना जाता है। 
  • गुलिक का शनि के साथ होने से अधिकतर कोढ होना देखा गया है,राहु के साथ होने से जातक को खून की बीमारी और जातक की मौत जहर खाने से होती है। 
  • गुलिक का राहु-केतु के साथ होना जातक को अग्नि सम्बन्धी कारकों से मृत्यु को सूचित करता है। 


गुलिक और आयुर्दाय

 जातक की आयु गणना के लिए सूर्य, चंद्र, गुलिक एवं लग्न से प्राण, देह तथा मृत्यु स्फुट निकालें और फिर प्राण तथा देह स्फुट का योग करें। यह योग यदि मृत्यु स्फुट से अधिक हो, तो जातक को दीर्घायु जानना चाहिए। यदि मृत्यु स्फुट देह एवं प्राण स्फुट के योग से अधिक हो, तो जातक की अकाल एवं अनायास मृत्यु जाननी चाहिए।

प्राण, देह एवं मृत्यु स्फुट निम्नलिखित प्रकार से निकालें -

प्राण स्फुट = लग्न स्पष्टांश × 5गुलिक स्पष्ट ।

देह स्फुट = चंद्र स्पष्टांश × 8 गुलिक स्पष्ट ।

#मृत्यु स्फुट = गुलिक स्पष्ट × 7 सूर्य स्पष्टांश ।

 

उदहारण - स्व. इंदिरा गांधी की कुंडली में मृत्यु देह और प्राण स्फुट के योग से अधिक था, इसलिए उनकी अप्रत्याशित मृत्यु हुई थी। 



 गुलिक प्रदत्त राजयोग 

 गुलिक का राश्याधीश अथवा नवांशपति अथवा दोनों यदि जन्मकुंडली के केन्द्र अथवा त्रिकोण में हों, स्वराशि अथवा उच्चराशि के हों तो गुलिक प्रदत्त दोष के साथ ही प्रबल राजयोग भी फलित होता है। 


गुलिक पर मेरा अनुभव

1. गुलिकेश और गुलिक नवांशेश का रत्न धारण करना बहुत घातक परिणाम देता है।

2. गुलिकेश या गुलिक नवांशेश की दशा के दौरान लंबे समय तक चलने वाला रोग व्यक्ति को परेशान रखता है।

3.यदि नवम-दशम भाव अथवा भावेश या सूर्य के साथ गुलिक बैठा हो तो भयंकर पितृदोष की सूचना देता है।

4.यदि राहु के साथ गुलिक षष्ठ भाव मे बैठा हो तो जातक अभिचार कर्म से बहुत ज्यादा पीड़ित रहता है।

5.यदि सूर्य के साथ राहु कुम्भ राशि या नवमांश में हो जातक को पितासुख कम मिलता है। पिता के साथ संबंध अच्छे नहीं रहते।

6. गुलिक अकेला ही "महापुरुष" जैसे योग को भी निर्बल करने मे  सक्षम है।


गुलिक दोष हेतु उपचार

अरिष्ट की निवृत्ति एवं इष्ट की प्राप्ति के लिए भारतीय ज्योतिष में अनेक प्रकार के उपाय एवं उपचार बताये गये हैं। गुलिक के उपचार के लिए महर्षि पराशर लिखते हैं -

1. ‘दीपो शिवालये भक्त्या गोघृतेन प्रदापयेत’ अर्थात् भगवान शिव के मंदिर में सायं गो घृत का दीपक जलाएं। 

2. गुलिक दोष की शान्ति के लिए गर्ग-पराशरादि मुनियों के द्वारा बताई गई शास्त्रीय पद्धति पर आधारित हमारा त्रिदिवसीय गुलिक शान्ति पूजन कराएँ । गुलिक शान्ति पूजन कराने के लिए हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान से सम्पर्क करें ।  

3. अन्य उपायों में सूर्य तथा विष्णोपासना भी गुलिक प्रदत्त दोषों को शांत करती है। 

4. यदि गुलिकेश या गुलिक नवांशेश की दशा के दौरान कोई लम्बे समय तक चलने वाला रोग हो तो उसके लिए मेरे शोध पर आधारित "रोगविनाशक हनुमन्प्रयोग" नामक एक वर्षीय साधना करें।


अपने कुण्डली में गुलिक के सम्पूर्ण विश्लेषण के लिए हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान  से अभी सम्पर्क करें। 


पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Mob.- +91 9341014225.

Fb-@ptbrajesh.

Friday, 11 August 2023

गुलिक का तिलिस्म - २

 गुलिक का तिलिस्म

भाग - २  


अपने पिछले पोस्ट में मैने गुलिक साधन के बारे में विस्तार से बताया था ।  उसके बाद से ही कई जिज्ञासुओं ने मुझसे गुलिक के बारह भावों में फल जानने के लिए प्रश्न किये। आज अपने गुलिक संबंधी दूसरे पोस्ट के माध्यम से मैं उन सभी जिज्ञासुओं के साथ साथ जनसामान्य के ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से गुलिक पर विस्तृत और संपूर्ण पोस्ट साझा कर रहा हूँ।





ज्योतिष शास्त्र में सात पिंड ग्रहों के अलावा, 6अप्रकाश ग्रह 9 उपग्रह  2 छाया ग्रह, इस प्रकार 17 गणितीय बिंदुओं की कल्पना की गई है। कहीं कहीं ग्रंथों में मांदी और गुलिक को अलग अलग ग्रह मान कर उनको अलग अलग स्पष्ट करने का तरीका भी बताया गया है। लेकिन वास्तव में गुलिक और मांदी अलग अलग नहीं बल्कि एक ही हैं। मांदी ही गुलिक है, मांदी और गुलिक को अलग अलग समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।


वैद्यनाथ दीक्षित अपने जातक पारिजात नामक ग्रंथ में नव उपग्रहों का इस प्रकार परीचय देते है-

काल परिधि घूमार्द्ध प्रहरा ह्वयाः। 

यमकंटक कोदंड मान्दि पातोपकेतवः।। 

अर्थात- सूर्यादि नव ग्रहों के क्रमशः काल, परिधि, धूम, अर्धयाम, यमघंट, कोदंड, मांदि, पात तथा उपकेत- ये नौ उपग्रह हैं। 

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रं में इन उपग्रहों को ‘अप्रकाश ग्रह’ कहा गया है। वहाँ इनके अलावा धुमादि 6 ग्रहों की और गिनती की गई है। जिनमे से पाँच को सूर्य का दोष बताया गया है । 

आचार्य मंत्रेश्वर ने ‘फलदीपिका’ के पच्चीसवें अध्याय के प्रथम श्लोक में उपर्युक्त नव उपग्रहों को प्रणाम करते हुए मांदि अथवा गुलिक के विभिन्न भावों में स्थित फल की चर्चा की है। 

उन्होंने लिखा है - 

गुलिकस्य तु संयोगे दोषान्सर्वत्र निर्दिशेत्' 

अर्थात्- गुलिक के संयोग से सर्वत्र दोष ही होते हैं | 

नोट - छठे और ग्यारहवें भाव में दोष कुछ कम होता है। 


गुलिक स्पष्ट करना  

किसी भी स्थान के दिनमान या रात्रिमान में 8 का भाग दे कर प्रत्येक भाग में एक-एक उपग्रह की स्थिति मानी गयी है। आठवें  को निरीश माना गया है। जिस खंड का अधिपति शनि होता है, उसी में मांदि की स्थिति मानी गयी है। प्रत्येक दिन के इन भागों के अधिपतियों की गणना उस दिन के वारेश से की जाती है। रात्रि के प्रथम खंड के अधिपति का निर्धारण उस वार के वाराधिपति से पंचम ग्रह से करना चाहिए। वार संख्या और अष्टमांश को गुणा करने पर प्राप्त  इष्ट काल से लग्न साधन की प्रक्रिया के अनुसार जो लग्न निकलेगा वह गुलिक खंड के अंतिम बिंदु का लग्न स्पष्ट होगा। इस संदर्भ में बृहतपाराशरहोराशास्त्रम् का निम्न श्लोक विशेष रूप से दृष्टव्य है: 

गुलिकारम्भ काले यत् स्फुटं यज्जन्म कालिकम्। 

गुलिकं प्रोच्यते तस्ताम् जातकस्य फल वदेत्।। 

अर्थात्- गुलिक लग्न का निर्णय गुलिक काल के प्रारंभ बिंदु को गुलिक का इष्ट काल मान कर गुलिक इष्ट की गणना करनी चाहिए। 

गुलिक लग्न साधन के सन्दर्भ में मेरा सम्बद्ध पोस्ट देखें

गुलिक साधन - Facebook लिंक

गुलिक साधन - Website लिंक

पहले भाव में गुलिक का फल

पहले भाव में गुलिक की उपस्थिति में जातक क्रूर स्वभाव का होता है उसके अन्दर दया नही होती है,उसकी आदत के अन्दर चोरी करना छुपाकर बात करना और कठोर भाषा का बोलना और मंद बुद्धि का फ़ल देता है। सन्तान सुख उसे नही के बराबर ही मिलता है या तो सन्तान होती  ही नही है और होती भी है तो बुढापे में छीछालेदर करने वाली होती है,ऐसा जातक धर्म कर्म को नही मानता है और जितना हो सकता है भौतिकता पर अपना बल देता है। यदि गुलिक लग्न में हो, तो जातक कृश, चोर, क्रूर, विनयरहित, क्रोधी, मूर्ख और भीरु प्रकृति का होता है। ऐसा जातक शास्त्र विरोधी, विषय वासना में लिप्त तथा लंपट स्वभाव का होता है।


दुसरे भाव में गुलिक का फल

दूसरे भाव वाला जातक झूठ बोलने की कला में माहिर होता है,उसे शान्ति कभी अच्छी नही लगती है केवल कलह करने से उसे सन्तोष मिलता है,धन की भावना बिलकुल नही होती है केवल किसका मुफ़्त में मिले और उसका प्रयोग करने के बाद फ़िर से कोई दूसरा शिकार तलासना उसका काम होता है। ऐसा जातक कभी भी एक स्थान पर नही बैठता है हमेशा दर दर का भटकाव उसके जीवन में मिलता है। इस प्रकार के जातकों की जुबान का कोई भरोसा नही होता है,वे आज कुछ बोलते है और कल क्या बोलने लगें कोई भरोसा नही होता है। जन्मकुंडली में मांदि यदि द्वितीय स्थान में हो, तो जातक कटुभाषी तथा व्यर्थ का वाद-विवाद करने वाला होता है। जातक के पास धन-धान्य की कमी रहती है तथा वह प्रायः घर से दूर रहता है।

जिस जातक के दूसरे भाव में गुलिक हो वह जल्दी जल्दी भोजन करने वाला और कठोर व रुखी बोली बोलने वाला होता है। यह जातक एसिडिटी से परेशान रहता है, और लीवर संबंधी समस्याएँ इसे घेरे रहती हैं। युवावस्था में ही इसके नेत्र कमजोर और शरीर शिथिल हो जाते हैं तथा सर खल्वाट्(गंजा) हो जाता है।


तीसरे भाव में गुलिक का फल

तीसरे भाव के गुलिक वाला जातक क्रोधी होता है,उसे घमंड कूट कूट कर भरा होता है,इसके अलावा वह हमेशा लालच करने वाला होता है।किसी सभा समाज से वह नफ़रत करता है,एकान्त मे रहना और शराब कबाब के भोजन करना उसकी शिफ़्त होती है। अक्सर इस प्रकार के जातक जुआरी भी होते है। यदि गुलिक तीसरे घर में हो, तो जातक घमंडी, क्रोधी और लोभी होता है। ऐसे व्यक्ति को भाई-बहन का सुख बहुत कम मिलता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः अकेले रहना पसंद करता है तथा अत्यंत मद प्रिय (घमंडी, अथवा व्यसनी, अथवा दोनों) होता है। 


चौथे भाव में गुलिक का फल

चौथे भाव के गुलिक वाला जातक हमेशा अपने घर वालों से शत्रुता किये रहता है उसे अपने ही भाई बहिनो से दुश्मनी और क्षोभ रहता है। अक्सर इस गुलिक वाले जातक को कभी भी वाहन का सुख नही मिलता है। जिसकी जन्मकुंडली में मांदि चतुर्थ भाव में स्थित हो, वह व्यक्ति प्रायः बंधु एवं धनहीन होता है।


पांचवे भाव में गुलिक का फल

पांचवे भाव के गुलिक वाले जातक को संतान का सुख नही मिल पाता है,और अक्सर उनकी पत्नी और पत्नी के परिवार वालों से सामजस्य नही बैठ पाता है। अपनी ही संतान के द्वारा वह अपमानित होता है और अपनी ही सन्तान उसकी मौत का कारण बनती है। यदि गुलिक पांचवें घर में हो, तो जातक दृढ़ बुद्धि होता है। उसके निर्णय क्षण-क्षण बदलते हैं तथा वह किसी एक बात पर दृढ़ नहीं रह पाता। ऐसे व्यक्ति की नैतिक मूल्यों पर भी आस्था नहीं होती तथा वह अल्प संतान वाला होता है। 


छठे भाव में गुलिक का फल

जातक के अन्दर काम करने में आलस होता है वह बैठा रह सकता है लेकिन कोई भी दैनिक काम करने के लिये उसकी आदत नही होती है,यहाँ तक कि वह रोजाना मलमूत्र त्याग और रोजाना के नहाने धोने के कार्यों से भी दूर रहता है। इसके साथ ही शमशान सिद्धि और भूत प्रेत वाली बातों में अपना लगाव भी रखता है। अक्सर इस प्रकार के जातकों का नाम उसके पुत्र करते है और वे आगे से आगे बढने वाले होते हैं। जिसके छठे घर में गुलिक हो, वह बहुत शूरवीर होता है तथा उसके शत्रु उससे प्रायः पराजित ही रहते हैं। ऐसा व्यक्ति भूत विद्या का शौकीन होता है। जो व्यक्ति डाकिनी, शाकिनी, यक्षिणी, भूत-प्रेत आदि की आराधना कर उनसे काम निकालते हैं, उन्हें भूत विद्या का प्रेमी कहा जाता है


सातवें भाव में गुलिक का फल

पति या पत्नी में आपस में शत्रुता और कभी भी एक दूसरे के विचारों का नही मिलना,इसके साथ ही अगर इस प्रकार का जातक किसी के साथ भी काम करता है तो साझेदारी की पूरी की पूरी हिस्सेदारी वह चालाकी से खा जाने वाला होता है। हर किसी से उसे लडाई करने में मजा आता है और जहां भी लडाई होती है वह वहां जाकर अपना भाव जरूर प्रदर्शित करता है। एक से अधिक जीवन साथी बनाना उसकी आदत में होता है। यदि गुलिक सातवें घर में हो, तो जातक कलह प्रिय तथा समाज से द्वेष करने वाला होता है। ऐसा जातक अनेक स्त्रियों से संबंध स्थापित करता है। वह कामी और कृतध्न दोनों ही होता है।


आठवें भाव में गुलिक का फल

आठवें भाव के गुलिक वाला जातक ठिगने कद का होता है। उसके बचपन में उसकी आंख में आघात होता है,अक्सर इस प्रकार के जातक हकलाने वाले भी होते है,अधिक खर्च करना और अपनी पत्नी या पति के स्वभाव से व्यथित रहना भी मिलता है। इस प्रकार के जातकों का धन अधिकतर मामलों में पुत्री धन ही बनता है,पुत्र संतान या तो होती नही है और अगर होती भी है तो परिवार से दूर चली जाती है,पुत्रियों की राजनीति से घर में विद्रोह पैदा होता है।यदि गुलिक अष्टम् भाव में हो, तो जातक का शरीर छोटा होता है। चेहरे तथा नेत्रों में कोई अस्वाभाविकता होती है। तात्पर्य यह है कि ऐसे जातक के शरीर मेें कोई दोष, अथवा विकलांगता अवश्य होती है।


नवें भाव में गुलिक का फल

नवे भाव के गुलिक वाला जातक भाग्य हीन होता है और वह अधिकतर अपने ही परिवार से हमेशा के लिये दूर हो जाता है,भाग्य और धर्म के मामलों मे वह जाना नही चाहता है और अगर जाता भी है तो वह उनके अन्दर कोई ना कोई दखल ही देता है। यदि किसी कुंडली के नवम भाव में गुलिक स्थित हो, तो जातक अपने गुरु तथा पुत्र से हीन होता है। यहां गुरु का तात्पर्य पिता से भी है।


दसवें भाव में गुलिक का फल

जातक पापी अधर्मी और धार्मिक स्थानों का तिरस्कार करने वाला होता है,धर्म की ओट में वह कमाकर बेकार के बुरे कर्मों को करने में तथा ऐयासी में खर्च करने वाला होता है।यदि दशम घर में गुलिक हो, तो जातक अशुभ कर्म करने वाला होता है। उसके हाथ एवं शरीर से दान, धर्म, यज्ञादि जैसे शुभ कार्य नहीं होते। 


ग्यारहवें भाव में गुलिक का फल

इस भाव के गुलिक का फ़ल जातक के लिये साहसी बनाने वाला होता है,और अधिकतर मामलों में वह न्याय वाले काम करता है।एकादश भाव का गुलिक जातक को सुखी, धनी, अति तेजस्वी तथा कांतिवान बनाता है। उसे पुत्र सुख भी प्राप्त होता है। 


बारहवें भाव में गुलिक का फल

इस भाव के गुलिक वाला जातक परदेश में रहने वाला और मलिन स्थानों में निवास करने वाला था अपव्ययी होता है,अक्सर इस प्रकार के जातकों का निवास किसी शमशान या मुर्दा स्थान के आसपास होता है।यदि मांदि द्वादश भाव में हो, तो जातक व्यर्थ भ्रमण करने वाला, अपव्ययी तथा व्यसनी होता है। ऐसा जातक विषय सुख से रहित तथा दीन और निर्धन होता है। 


अपने अगले पोस्ट गुलिक का तिलिस्म - भाग 3 में गुलिक के सम्बंध में और भी कई रोचक जानकारियाँ तथा अपना अनुभव लेकर आऊंगा । साथ ही गुलिक के दोष शांति हेतु शास्त्रीय उपाय भी बताउँगा।


अपने कुंडली में गुलिक के सम्पूर्ण जांच पड़ताल कराने हेतु सम्पर्क करें 


To be Continued...

पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Mob. - +91 9341014225.

Thursday, 10 August 2023

गुलिक का तिलिस्म - १

 

गुलिक का तिलिस्म 

भाग - १

गुलिक साधन

ज्यौतिष शास्त्र में प्रत्यक्ष ग्रहों के अलावा कुछ अप्रकाश ग्रह भी महर्षि पाराशर ने बताए हैं। उनमें गुलिक सबसे खतरनाक माना जाता है। ये अकेले ही बड़े बज़े राजयोगों को पानी पिलाने सक्षम देखा गया है। गुलिकेश और गुलिक नवांशेश की दशा बहुत खतरनाक रहती है। व्यक्ति दशा पर्यन्त अस्वस्थ रहता है। गुलिकेश या गुलिक नवांशेश का रत्न बहुत हानिकारक होता है। इसलिए गुलिकेश ग्रह का रत्न कभी नहीं पहनना चाहिए फिर चाहे वो लग्नेश ही क्यों न हो। आइए आज आपको गुलिक साधन प्रक्रिया उदाहरण के साथ  समझाता हूँ।





परिभाषा

दिनमान/रात्रिमान के  अष्टमांश को सूर्योदय/सूूर्यास्त में लगातार जोड़ने पर प्राप्त शनिवारखण्ड का नाम गुलिक है।

गुलिक के लिए वार गणना दिन में जन्म होने पर उसी वार से और रात्रि में जन्म होने पर पाँचवें वार से प्रारम्भ करें और शुक्रवार तक गिनें।


गुलिक साधन सूत्र

दिन में जन्म होने पर -

1.(सूर्यास्त-सूर्योदय)=दिनमान।

2.दिनमान÷8=अष्टमांश

3.अष्टमांश x वारसंख्या=शनिखण्ड़।

4. सूर्योदय+शनिखण्ड=गुलिक-काल


अब इस गुलिक काल का लग्नसाधन प्रक्रिया द्वारा लग्नसाधन करें अथवा कुण्डली सोफ्टवेयर में समय ड़ालकर लग्न जान लें यही गुलिक लग्न हुआ।


रात्री में जन्म होने पर -

1. सूर्यास्त - सूर्योदय=दिनमान।

2. 24 घं.-दिनमान= रात्रिमान।

3.रात्रिमान÷8= अष्टमांश

4.अष्टमांशxवारसंख्या= शनि खण्ड।

5.सूर्यास्त+शनिखण्ड=गुलिक काल।


अब इस गुलिक काल का लग्नसाधन प्रक्रिया द्वारा लग्नसाधन करें अथवा कुण्डली सोफ्टवेयर में समय ड़ालकर लग्न जान लें यही गुलिक लग्न हुआ।


गुलिक साधन का उदाहरण

१. दिन में जन्म का उदाहरण -

D.O.B - 20/03/1997; 

T.O.B - 11:20A.M;  

P.O.B - Bokaro (Jharkhand).

सूर्योदय - 05:51

सूर्यास्त - 05:54 (17:54)

जन्मदिन - गुरुवार ।

  • जन्म दिन में होने के कारण वार गणना गुरुवार से ही शुरु होगी। गुरुवार से शुरुकर शुक्रवार तक गिनने पर वार संख्या = 2।

सूत्रानुसार

(1) 17:54 - 05:51 = 12:03, 

(2) 12:03 ÷ 08 = 1:30 

(3) 1:30 x 2 = 2:60

                 =3:00

(4) 05:51 + 3:00 = 08:51.


  • अब 20/03/1997 को 8:51 बजे का सोफ्टवेयर के माध्यम से लग्न निकालने पर लग्न = वृष और नवमांश = मकर प्राप्त हो रहा है। इसलिए शुक्र गुलिकेश और शनि गुलिक नवांशेश हुए।


२. रात्रि में जन्म का उदाहरण -

D.O.B - 28/02/1991.

T.O.B - 00:45.

P.O.B - Delhi.

सूर्योदय - 6:50

सूर्यास्त - 6:17 (18:17)

जन्मदिन - बुधवार।

  • जन्म रात्रि में होने के कारण वार गणना बुध से पाँचवें अर्थात रविवार से होगी। रविवार से शुक्रवार तक गिनने पर प्राप्त वार संख्या= 6।


सूत्रानुसार

(1) 18:17 - 06:50 = 11:27.

(2) 24:00 - 11:27 = 12:33.

(3)12:33 ÷ 8 = 1:34

(4)1:34 x 6 = 9:24

(5)18:17 + 09:24 = 27:41.


  • अब 28/02/1991 को 27:41(03:41A.M) बजे का सोफ्टवेयर के माध्यम से लग्न निकालने पर लग्न=धनु और नवमांश कन्या प्राप्त हुआ। इसलिए गलिकेश गुरु और गुलिक नवांशेश शनि हुए।
नोट - गणना के लिए Web jyotishi के Astrology & horoscope सोफ्टवेयर का सहारा लिया गया है।


  • ऐप का लिंक -

Astrology and Horoscope सॉफ्टवेर डाउनलोड करें |


  • Astrology and Horoscope ऐप को प्रयोग करना सीखने के लिए यह वीडियो देखें -

Best app for Kundali - Watch Video



कुण्डली विश्लेषण में गुलिक बहुत महत्वपूर्ण रोल निभाता है। मैं तो कभी भी बिना गुलिक के कुण्डली विश्लेषण करता ही नहीं हूँ। लैपटाप में पाराशर लाइट सोफ्टवेयर अथवा जगन्नाथ होरा सोफ्टवेयर के जरिए आप गुलिक जान सकते हैं। 

मोबाइल पर ज्योतिष ऐप  नाम का एक ऐप है जिसका लिंक इस प्रकार है - 

Download Jyotisha App

इस ऐप से भी आप गुलिक जान सकते हैं। गुलिक आप स्वयं भी निकाल सकते हैं। 


  • गुलिक पर हिन्दी भाषा में मेरे तीन लेख हैं। जिसमें गुलिक निकालना उनका फल कहना आदि सब बताया गया है। क्रमशः उनको  शेयर करुँगा, यह उनमें से पहला लेख है। 
  • गुरुजी की ज्योतिष गहरे पानी पैठ में गुलिक पापग्रह शिरोमणि नामक लेख है। 
  • Charting the Astrologucal Ocean में भी है।
  •  थोडी बहुत जानकारी जन्मपत्री स्वयं देखिए में भी दी गई है।
  • Predictive Applications Of Sensitive Points पुस्तक में भी गुलिक के बारे में गुरुजी ने बहुत कुछ लिखा है।
  • प्राचीन ग्रन्थों में बृहत्पाराशर, फलदीपिका एवं जातकपारिजात आदि ग्रन्थों में गुलिक पर प्रचूर सामग्री मिलती है।

To be Continued...

पं. ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य (लब्धस्वर्णपदक)

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान 

मो.- +91 9341014225.

Wednesday, 2 August 2023

कुण्डली में संतान विचार का उदाहरण

कुण्डली में संतान विचार का उदाहरण



* पञ्चमभावस्थ नक्षत्र से छठे नक्षत्र में बृहस्पति होने संतान प्राप्ति में विलंब।


* पञ्चम भावस्थ नक्षत्र में पापग्रह सूर्य है। यह संतान प्राप्ति में प्रबल प्रधान बाधाकारक है।


* कई कारणों से शुक्र (निर्बल पंचमेश) संतान प्राप्ति में गौण बाधाकारक है।


* संतान भाव में अमावस्या तिथि का होना संतान सुख का अभाव दर्शा रहा है।  


* काल नवमांश में पंचमस्थ तीनों ग्रह का होना प्रबल संतान बाधा दर्शा रहे हैं।


* चर पुत्रकारक भी शुक्र ही है जो निर्बल होकर संतान सुख की प्रबल हानि कर रहा है।


* कुंडली में संतान प्राप्ति के अचूक योगों का नितान्त अभाव है।


* हस्तरेखा में भी संतान सुख की प्रबल रेखाएँ विद्यमान नहीं हैं।


* लग्न में आर्द्रा नक्षत्र तथा गुरुवार जन्म का संयोग संतान प्राप्ति में कुछ शारीरिक अक्षमता को दर्शाता है।


* आपके अंगलक्षण, हाव-भाव एवं स्वास्थ्य संबंधी बातें जो आपने बताईं उनसे भी संतान प्राप्ति के लिए अपेक्षित शारीरिक क्षमता का ह्रास सुस्पष्ट है।


* सूर्य-शुक्र-गुरु और पंचमेश स्फुट जीवन के आखरी पड़ाव में संतान प्राप्ति दर्शा रहा है।


* क्षेत्रस्पष्ट के अनुसार गर्भाशय के पुष्टता की पुष्टि हो रही है।


* क्षेत्रस्पष्ट का प्रजाढ्य राशि में होना संतान प्राप्ति के लिए एक सकारात्मक बात है।





* सप्तमांश कुंडली के अनुसार एक पुत्र का थोड़ा बहुत सुख मिलेगा ऐसा समझ में आता है।






निष्कर्ष


* बहुत उपायों के बाद ही संतान होगी।


* उपाय क्रमानुसार करने होंगे और लम्बे समय तक करने होंगे।


* किसी संतान को गोद लेने पर भी आपलोग विचार कर सकते हैं।


नोट - आयु परीक्षण किया। प्राप्त परिणामों के अनुसार कुंडली में दीर्घायु योग हैं। इसी हिसाब से आखरी पड़ाव में संतान पर विचार करना होगा।





संतानप्रद बृहस्पति गोचर


2 - कुम्भ

5 - वृष

7 - कर्क

9 - कन्या

11 - वृश्चिक


संतान कारक अन्तर्दशाएँ


* शनि-बुध - 27 अप्रैल 2026 से  05 जनवरी 2029 तक। नोट - यह समय बहुत प्रबल है क्योंकि इसमें गुरु तथा शनि का गोचर भी शुभ है।


* शनि-शुक्र - 13 फरवरी 2030 से 15 अप्रैल 2033 । नोट - यह समय बहुत प्रबल है क्योंकि इसमें गुरु तथा शनि का गोचर भी शुभ है।


* शनि-मंगल - 27 अक्टूबर 2035 से 05 दिसम्बर 2036 तक।


* शनि-गुरु - 12 अक्टूबर 2039 से 24 अप्रैल 2042 तक।





आपकी कुंडली विवेचना के अनुसार सन्तान प्राप्ति में अत्यंत सहायक उपाय


* सूर्य के बाधकत्व को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण का श्रद्धापूर्वक समर्पण भाव से पारायण करें।


* तुलाजननशान्ति कराएँ।


* सूर्य को नियमित अर्ध्य दें।


* गौण बाधक शुक्र के सर्वसामान्य उपाय करते रहें। दुर्गा माँ की विशेषरूप से आराधना करते रहें।


* पंचम भाव में अमावस्या तिथि के दोष निवारण के लिए भागवत् जी का मूलपाठ करा ले।


* काल नवमांश में स्थित ग्रहों के दोष निवारण के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करा लें।


* संतान सुख की कमी को दूर करने के लिए एकवर्ष तक संतानगोपाल प्रयोग करें।


* अपने खान-पान, दिनचर्या, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें स्वयं को सुदृढ़ करें। 


* ये सब उपाय करने के बाद उचित काल आने पर संतान प्राप्ति के लिए प्रयास करें। संतान प्राप्ति की प्रबल भावना रहने पर ईश्वर संतान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करेंगे।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

          (लब्धस्वर्णपदक)

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Mob.- +91 9341014225.

Thursday, 9 March 2023

दक्ष की 60 कन्याओं का विवाह - एक रोचक जानकारी

 

दक्ष की 60 कन्याओं का विवाह - एक रोचक जानकारी


दक्ष के कन्या संतति के संबंध में अलग अलग कल्पों के अनुसार अलग अलग पुराणों में अलग अलग कथा मिलती है जिसमें उनकी संख्या भिन्न-भिन्न बताई गई है। शिवमहापुराण और श्रीमद्भागवत्महापुराण के अनुसार  छठे मन्वन्तर में दक्षप्रजापति ने दशप्रचेतस के पुत्र के रूप में जन्म लिया और असिक्नी नामक पत्नी से उनको 60 पुत्रियाँ हुईं। जिनमें से 10 का विवाह धर्म के साथ 17  का विवाह कश्यपों के साथ 27 का विवाह चन्द्रमा के साथ 2 का विवाह कृशाश्व के साथ 2 का विवाह आंगिरस के साथ और 2 का विवाह भूत के साथ हुआ। 10+17+27+2+2+2 = 60 कन्याएँ। जिन 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ उन्हें ही हम 27 नक्षत्रों के नाम से जानते हैं। इसमें ये भी है कि चन्द्रमा का रोहिणी नक्षत्र से विशेष लगाव था। जिस कारण बाकी कन्याएँ दक्ष प्रजापति से इस बात की शिकायत करती हैं और दक्ष क्रोधित होकर चन्द्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दे देते हैं। फिर शिवजी चन्द्रमा की रक्षा करते हैं और उनके क्षय की अवधि 15 दिन की कर देते हैं जिसे हम कृष्णपक्ष के नाम से जानते हैं। साथ ही शिव जी ने उन्हें पूर्णस्वरूप प्राप्त होने का वरदान भी देते हैं। जिससे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा को अपने परमरूप को प्राप्त कर लेते हैं। रोहिणी के साथ चन्द्रमा के विशेष लगाव के पीछे का रहस्य ये है कि चन्द्रमा सभी नक्षत्रों में से रोहिणी नक्षत्र के योगतारे के सबसे नजदीक से गुजरता है कभी कभी तो अतिक्रमण भी कर देता है। योगतारा उसे कहते हैं जो किसी नक्षत्र का प्रधान तारा हो। चन्द्रमा जिस चमकदार तारे के सबसे नजदीक से होकर गुजरता है उसे उस नक्षत्र का योगतारा कहा जाता है। आशा है खगोलविज्ञान की ये रहस्यमयी जानकारी आपको रोमांचक लगी होगी।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

Saturday, 31 December 2022

बाधकग्रहों पर शोधकार्य के दौरान प्राप्त अनुभव

मन की बात



बाधक ग्रह पर तथ्यों के अन्वेषण के दौरान मुझे सर्वार्थचिन्तामणि ग्रंथ अध्याय 18 श्लोक 2 मिला। इसके प्रथम पद 'क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम्' का अर्थ लगाने के लिए मैं दो दिनों तक बहुत परेशान रहा, अनेक प्रयास किए। लेकिन बहुत प्रयास करने के बाद भी ये समझ नहीं आ रहा था कि 'रागद्विशरीरभाजाम्' का क्या अर्थ किया जाए? टीकाकारों ने इसका अर्थ चर, स्थिर, द्विस्वभाव किया था। लेकिन यह कैसे संभव होगा, इस बात को लेकर मेरा मन लगातार चिन्तन कर रहा था, क्योंकि प्रकरण के अनुसार तो यही अर्थ अपेक्षित था पर यह अर्थ 'रागद्विशरीरभाजाम्' से स्पष्ट नहीं हो रहा था। खेमराज से प्रकाशित हिन्दी टीका के महान टीकाकार ने तो न जाने क्या देखकर चर, स्थिर द्विस्वभाव भी लिखा और द्विशरीरभाजाम् को  देखकर राहु-केतु भी लिखा। मतलब देखकर मन ने उनके लिए कहा- हैं तो महानै वाले। यहाँ कहीं से भी राहु-केतु न तो वर्णित है न वांछित है। पर कापी पेस्ट भी करना है और अपनी अकल भी लगानी है (जो कि है ही नहीं उनके पास) तो ऐसा ही अनर्थ होगा। इसके अलावा भी मैंने सर्वार्थचिन्तामणि की कई टीकाएँ देखीं, लेकिन संतुष्ट नहीं हुआ। फिर थक हार कर दूसरे दिन मैंने अपने परिचित् ज्योतिर्विद् मित्रों को यह श्लोक भेजा और निवेदन किया कि 'रागद्विशरीरभाजाम्' को स्पष्ट करें। कई लोगों ने तो प्रयास ही नहीं किया, कई लोगों ने कुछ बहाने बता कर मना कर दिया। एक प्रिय मित्रमणि ने कुछ प्रयास किया अर्थ लगाने का पर मैं संतुष्ट नहीं हुआ, फिर एक घंटे बाद उन्होंने ही अन्वेषण करके मुझे फोन किया और कहा यदि क्रमाच्च और रागद्विशरीरभाजाम् के बीच का स्पेस मिटा दिया जाए तो अर्थ लग जाएगा क्या??? मैंने तुरंत उनका स्पेस हटाया उनको मिलाया- 'क्रमाच्चरागद्विशरीरभाजाम्' और....... अरे... अर्थ लग गया एकदम तुरंत और सुस्पष्ट क्रमात् + चर + अग(स्थिर) + द्विशरीर (द्विस्वभाव) + भाजाम् (संज्ञकेषु) = क्रमाच्चरागद्विशरीरभाजाम्। ये क्या जादु था भई। मतलब 'मौज कर दी तन्ने बेटे मौज कर दी' वाली फिलिंग आने लगी। फिर मैंने सभी टिकाएँ चेक की लेकिन सभी टीकाकारों ने 'क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम्' स्पेस के साथ ही लिखा था। मतलब सब के सब बस यहाँ से उठा के वहाँ छापने में लगे हैं किसी एक ने गलती कर दी तो किसी ने उसको सुधारना जरूरी नहीं समझा पिष्टपेषण करते रहे और अपने अपने नाम से टीकाएँ छपवाते रहे। 


एक और अनुभव -

लगभग चार वर्ष पूर्व एक बार इस स्पेस ने मुझे और परेशान किया था। मुहूर्तचिन्तामणि की एक पंक्ति है कदास्त्रभे... मुझसे किसी ने पूछा इसका अर्थ बताइए। मैं लग गया अपने काम पर कदा + स्त्रभे लगाता रहा कोई अर्थ ही न लगे, परेशान हो गया क्या मामला है अर्थ क्यों नहीं लगता। संयोग से मैं वृंदावन में था गुरुजी के पास गया उनको दिखाया उन्होंने कुछ कहा नहीं 'गुरोस्तुमौनव्याख्यानम्'  छट से पेन उठाया और 'क-दास्त्रभे' कर दिया। अरे वाह ये क्या हो गया, अब इसका अर्थ कौन नहीं लगा पाएगा? क (ब्रह्मा) अर्थात् रोहिणी  दास्त्र (अश्विनी) भे (नक्षत्र में)। देखते देखते सेकेंडों में तुरंत समाधान हो गया,  जिसको लेकर मैं घंटों परेशान था।


बाधकग्रहों पर शोधकार्य के दौरान प्राप्त अनुभव


निष्कर्ष -

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिली, हमें इन्हीं मामलों में तो गुरु की जरूरत होती है। वो अतिरिक्त स्पेस मिटा देते हैं या आवश्यक स्पेस लगा देते हैं और हम शिष्य छिन्नसंशयाः हो जाते हैं। ज्योतिष भी समाज की इसी प्रकार तो सेवा करता है, जो उनके भाग्य में तो है लेकिन अज्ञानतावश उनका दृष्टिकोण वहाँ पहुँच नहीं पा रहा है ज्योतिष अनावश्यक स्पेस को मिटा देता है या आवश्यक स्पेस (उपाय आदि) लगा देता है, नवीन दृष्टिकोण से जो आपको प्राप्त होने के बावजूद नहीं मिल पा रहा है उसे प्राप्त करा देता है। जो ज्योतिष शास्त्र स्वयं वेद का नेत्र है वो क्या आपके जीवन का पथप्रदर्शन नहीं करेगा? निश्चित रुप से करेगा और करोडों वर्षों से करता ही आ रहा है।  

देखिए कहने को तो उक्त गलती छोटी कही जा सकती है, लेकिन कैसे उसके कारण पूरा अर्थ ही विलुप्त हो रहा था। इसलिए भास्कराचार्य जी ने ज्योतिष पढ़ने के अधिकारी बनने के लिए अनिवार्य योग्यताओं में शब्दशास्त्र (व्याकरणशास्त्र) में अतिशयेन पटुः होना लिखा है। अगर अतिशयेन पटुः होंगे तो क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम् नहीं लिखेंगे। लिखा भी हो तो समझ में आ जाएगा कि इनको मिलाकरके लिखना है। यदि अतिशयेन पटु होंगे तो जबरदस्ती द्विशरीरभाजाम् का अवांछित राहु-केतु अर्थ नहीं करेंगे। 


उपसंहार -

सुधि जनों ! ज्योतिष बहुत गहन शास्त्र है। यह एक ऐसा इकलौता शास्त्र है जो सभी शास्त्रों के रक्षण पोषण में सहायता प्रदान करता है। यह शास्त्र केवल ज्योतिष शास्त्रज्ञों का ही नहीं बल्कि अन्य भी सभी शास्त्रज्ञों के योगक्षेम का वहन करने में सहायक सिद्ध होता है। यह लोकोपकारी विद्या मातृवत् हमारा रक्षण, पोषण और पालन करती है। इसलिए मैं आप सभी लोगों से करबद्ध निवेदन करता हूँ, तन्मयता से इस शास्त्र का मनन चिन्तन करें, अध्ययन करें और बहुत सावधानी पूर्वक फलादेश में प्रवृत्त हों। कदाचित् आपकी किसी गलती के कारण इस महान् शास्त्र को उपाहास का पात्र कोई न बना ले।


© ज्यौतिषाचार्य पं. ब्रजेश पाठक - Gold Medalist











Wednesday, 28 December 2022

क्या हैं राहु और केतु ?

  क्या हैं राहु और केतु ?


राहु-केतु का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में भय उत्पन्न हो जाता है। तो कई लोगों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि भला ये राहु केतु हैं क्या? विज्ञान के छात्र ये प्रश्न भी करते हैं कि यदि राहु केतु ग्रह हैं तो उनका कोई भौतिक पिण्ड क्यों दिखाई नहीं देता। इस तरह के कई सवाल लोगों के मन में अपने ग्रंथों के प्रति अनास्था का भाव उत्पन्न करते हैं । लोग अपने ऋषि मुनियों के ज्ञान को बेतुका और तुच्छ समझने लगते हैं। इन्ही कारणों से राहु-केतु संबंधी सभी प्रश्नों का जवाब आपके ज्ञानवृद्धि हेतु प्रस्तुत है।

राहु केतु की परिभाषा करते हुवे "गोल परिभाषा" नामक ग्रन्थ में कहा गया है-

विमण्डले भवृत्तस्य सम्पातः पात उच्यते।

एवं चन्द्रस्य यौ पातौ तत्राद्यौ राहुसंज्ञकः

द्वितीयः केतुसंज्ञस्तौ ग्राहकौ चन्द्रसूर्ययोः।।


ग्रहकक्षा को विमण्डल वृत्त कहा जाता है। सूर्य के विमण्डल वृत्त को क्रान्तिवृत्त या भवृत्त कहते हैं । जबकि बाकी ग्रहों के विमंडल वृत्त उनके नाम से ही पुकारे जाते हैं, यथा- चंद्र विमंडल वृत्त, भौम विमंडल वृत्त आदि। यह क्रान्तिवृत्त विमण्डल वृत्त से होकर गुजरने के कारण  विमण्डल वृत्तों को दो जगहों पर काटता है। इन्ही कटान बिंदुओं या सम्पात (पात) स्थानों में से उत्तरी कटान बिन्दु  को राहु तथा दक्षिणी सम्पात बिन्दु को केतु कहा जाता है। परंतु ज्यौतिष में जहाँ कहीं भी केवल राहु या केवल केतु शब्द का प्रयोग होता है वहाँ उनका अर्थ चंद्रमा के राहु-केतु से ही लिया जाता है। बाकि ग्रहों के पातों को उन ग्रहों के नाम से ही बुलाया जाता है, यथा- गुरु के राहु-केतु/पात, शनि के राहु-केतु/पात आदि।  चंद्रमा पृथ्वी से नजदीक है और इसके दोनों पात पृथ्वी में रह रहे जीवों को ज्यादा प्रभावित करते हुवे हमारे ऋषियों को अनुभूत हुवे हैं इसलिए ज्योतिषीय गणनाओं में चंद्रमा के पातों को विशेष महत्व दिया गया है। चंद्रमा के पातों को भी ग्रह माना गया है, जबकि इनका कोई भौतिक पिंड नहीं है।





आइये इन पातों के सम्बन्ध में कुछ विशेष तथ्य जानें- 

१. दो वृत्तों के कटान बिन्दु हमेशा आमने सामने अर्थात           180°· के अन्तर पर होते हैं।

२. राहु-केतु भी हमेशा एक दुसरे से 180° के अन्तर पर अर्थात एक दूसरे सेे छः राशियों (३०×६=१८०·) के अन्तर पर रहते हैं। 

3. इसलिए राहुस्पष्ट करने के बाद उसमे 6 राशी जोड़ने से केतुस्पष्ट हो जाता है । 

4. केतु को अलग से स्पष्ट करने की जरुरत नहीं पड़ती।

5. ये ग्रह के विपरीत दिशा में चलते हैं अर्थात वक्री रहते हैं। इनकी चाल ग्रह की तरह पूर्व से पश्चिम न होकर पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर रहती है।


आप परीक्षण के लिए किसी की भी लग्न कुण्डली को उठा कर देख सकते हैं या पञ्चांग उठा कर देख सकते हैं। यही राहु केतु सूर्य व चंद्र ग्रहण के लिए उत्तरदायी हैं। ज्यौतिष में "ग्रहणं करोतीति ग्रहः" से ग्रह की परिभाषा कही गई है अर्थात जो फलों का ग्रहण करे वो ग्रह है। उद्देश्य भिन्न-भिन्न होने से हमारे ज्यौतिष मनीषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों की ग्रह संबंधी परिभाषा अलग-अलग है । हमारी परिभाषा में चन्द्रमा ग्रह है जबकि उनकी परिभाषा में उपग्रह । ज्यौतिष में प्रधान रूप से 7 ग्रह ही माने गए हैं । राहु केतु को ज्योतिष में  केवल ग्रह नहीं बल्कि तमोग्रह/छायाग्रह कहा गया है। केवल राहु केतु ही ऐसे नहीं हैं जिन्हे ग्रह कहा गया है बल्कि गुलिक, धूम, व्यतिपात, परिवेश इन्द्रचाप, उपकेतु आदि को भी ग्रह कहा गया है परन्तु इन्हें अप्रकाश ग्रह कहते हैं। कृष्ण विवर(Black hole) भी राहु है पर ये वो राहु नहीं जो  ज्योतिष में ग्रहण किए गए हैं तथा जो सूर्य व चंद्र ग्रहण के उत्तरदायी हैं जिनकी ऊपर चर्चा की गई हैं बल्कि ये वो राहु है जिनकी संहिता ग्रन्थों में चर्चा की गई हैं। ज्यौतिष अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत ज्ञान से परिपूर्ण है जो की हमें प्रकृति के कार्यप्रणाली को समझाता भी है और ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग भी सुगम करता है। ज्यौतिषवेत्ता ब्रह्माण्ड का ज्ञान रखने के कारण ईश्वर के ज्यादा करीब होता है और संसार का कल्याण करने में भी सक्षम होता है।


-पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान, लोहरदगा।

Sunday, 21 August 2022

महादशा फल लिखने का उदाहरण

 महादशाफल_लिखने_का_उदाहरण....


सूर्य महादशा में शुक्र अन्तर्दशा(25/11/2022 तक)


इस समय आप सूर्य की महादशा के अन्तर्गत शुक्र की अंतर्दशा से गुजर रहे हैं। इस दौरान मुख्य रुप से जलज वस्तुओं से धनप्राप्ति, परिश्रम की अधिकता, दुष्ट स्त्री का संग और लोगों से रुखे बर्ताव आदि फल प्राप्त होंगे ।





आपकी कुंडली मे शुक्र उच्चराशि का होकर त्रिकोण भाव में स्थित है, इसके प्रभाव से विप्र एवं राजा का दर्शन, उत्साह में वृद्धि,राज्यलाभ, यश-प्रतिष्ठा एवं मान-सम्मान की प्राप्ति जैसे शुभफल होंगे । घर में सभी प्रकार के कल्याण कार्य संपादित होंगे । प्रिय स्त्री से संबंध होगा तथा भोग एवं सुख के साथ साथ धन-संपत्ति की भी प्राप्ति होगी । 


शुक्र द्वादशेश होने से धनव्यय एवं व्यर्थ   भटकाव अनावश्यक यात्राएँ भी खूब कराएगा अर्थात् जीवन में अस्थिरता उत्पन्न करेगा, कामशक्ति का कारक होने से कामक्रीड़ा के प्रति आसक्ति बढ़ाएगा, महादशेश सूर्य का शत्रु होने से अकारण ही मित्रों से विरोध कराएगा, पञ्चम भाव में स्थित होने से विद्या के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित कराएगा तथा सप्तमेश/मारकेश होने से आपको अपमृत्यु(रोग, दुर्घटना, संकट आदि) भी प्रदान करेगा ।





द्वादशेश एवं सप्तमेशजन्य अशुभ फलों की शांति के लिए महामृत्युंजय जप या रुद्राभिषेक आदि कराना चाहिए । इसके साथ ही सफेद गाय या भैंस का दान करना चाहिए। शिव की कृपा हो जाए तो सब मंगल होगा।


सूर्य की महादशा में शुक्र अंतर्दशा एक वर्ष की होती है । यदि इस अन्तर्दशा  को चार-चार महिनों के तीन भागों में बाँट लिया जाए तो प्रारम्भ के चार महिनों(दिसम्बर, जनवरी, फरवरी, मार्च) में मिले जुले फलों की प्राप्ति होगी । मध्य के चार महिने(अप्रैल, मई, जून, जूलाई) लाभकारी एवं शुभकारी रहेंगे । तथा अंत के चार महिनों(अगस्त, सितंबर, अक्तूबर, नवम्बर) में यशोहानि, बंधुओं से द्वेष तथा परिवार में सुख की कमी आदि फल प्राप्त होंगे । 

सप्तमेश और द्वादशेश जन्य जो अशुभ फल बताए गए हैं उनकी अधिकांश अशुभता अंतिम चार महीनों में घटित होंगी ।





१. सूर्य-शुक्र-शुक्र प्रत्यन्तर फल (25/01/2022)-

शुक्र प्रत्यन्तर दशा में सफेद घोड़ा,वस्त्राभूषणादि की प्राप्ति, उत्तम स्त्री से समागम होता है।


२. सूर्य-शुक्र-सूर्य प्रत्यन्तर फल (12/02/22)-

सूर्य प्रत्यन्तर दशा में वातज्वर, सिर में पीड़ा, राजा व शत्रु से पीड़ा तथा थोड़ा लाभ होता है।


३.सूर्य-शुक्र-चंद्र प्रत्यन्तरफल (15/03/2022)-

चंद्रमा प्रत्यन्तर दशा  में कन्या का जन्म,राजा से लाभ,वस्त्राभूषणो की प्राप्ति, राज्य में किसी अधिकार की प्राप्ति भी होती है।


४. सूर्य-शुक्र-मंगल प्रत्यंतरफल(05/04/2022)-

मंगल प्रत्यन्तर दशा में रक्त व पित्त का विकार, कलह,अपमान,तिरस्कार व अधिक क्लेश होता है।


५. सूर्य-शुक्र-राहु प्रत्यन्तरफल(30/05/2022)-

राहु प्रत्यन्तर में स्त्रियों से कलह,अचानक भय का कारण राजा व शत्रु से कष्ट होता है।





६. सूर्य-शुक्र-गुरु प्रत्यन्तर फल(17/07/22)-

गुरु प्रत्यन्तर दशा में  खूब धन,बड़ा अधिकार, वस्त्राभूषणादि की प्राप्ति,हाँथी-घोड़े वाहनादि से युक्त पदवी की प्राप्ति होती है।


७. सूर्य-शुक्र-शनि प्रत्यन्तरफल(13/09/2022)-

शनि प्रत्यन्तर में गधा,खच्चर,ऊँट, बकरी आदि की प्राप्ति,लोहा काले उड़द व तिल आदि से लाभ तथा साधारण पीड़ा होती है।


८. सूर्य-शुक्र-बुध प्रत्यन्तरफल(04/11/2022)-

बुध प्रत्यन्तर दशा में धन व ज्ञान का अधिक लाभ,राज्य या राज्याधिकार की प्राप्ति, ठीक तरह से निवेश(इन्वेस्ट)करने से धन का लाभ होता है।


९. सूर्य-शुक्र-केतू प्रत्यन्तर फल(25/11/2022)-

केतू प्रत्यन्तर में अपमृत्यु का भय,स्थान-स्थान पर भटकना,दशामध्य में थोड़ा लाभ भी होता है।


।। शुभमस्तु ।।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

Friday, 19 June 2020

सूर्यग्रहण 21 जून की सम्पूर्ण जानकारी....

 सूर्यग्रहण 21 जून की सम्पूर्ण जानकारी....




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आप सब को ज्ञात ही होगा कि आषाढ़ कृष्ण अमावस्या दिन रविवार तदनुसार 21 जून 2020 को भारतवर्ष में सूर्य ग्रहण लगने वाला है। यह ग्रहण बहुत ज्यादा खास है, क्योंकि इस प्रकार का ग्रहण दशकों बाद लगता है और जैसा ग्रहण इस बार लग रहा है वैसा ग्रहण पुनः इस दशक में भारतवर्ष में दिखाई नहीं पड़ेगा, इसलिए यह ग्रहण बहुत ज्यादा ऐतिहासिक है । अगला सूर्यग्रहण जो भारत से होकर गुजरेगा वह 21 मई 2031 को होगा | तो आइए आज इस ग्रहण की विशेषताओं के बारे में जानते हैं साथ ही ग्रहण संबंधी कृत्याकृत्य सूतक तथा अन्य वैज्ञानिक और धर्मशास्त्रीय जानकारियां भी प्राप्त करेंगे।
21 जून 2020 को लगने वाला सूर्य ग्रहण दो प्रकार का होगा -
1. कंकण सूर्य ग्रहण (Annular Eclipse) और
2. आंशिक सूर्य ग्रहण (Partial Eclipse) ।
यह आपके क्षेत्र के लोकेशन पर निर्भर करेगा कि आप Annular Eclipse देख पायेंगे या Partial Eclipse।


 भारत में यह ग्रहण कहाँ कहाँ दिखाई देगा -

मुख्य रूप से कंकण सूर्यग्रहण भारतवर्ष के उत्तरवर्ती इलाकों जैसे राजस्थान, हरियाणा, उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड इत्यादि स्थानों में दिखलाई पड़ेगा, वहीं भारतवर्ष के दक्षिणी क्षेत्र में आंशिक सूर्यग्रहण ही दिखलाई पड़ेगा।

वलयाकार सूर्यग्रहण भारत में कहाँ-कहाँ दिखेगा ?

21 जून को उत्तर भारत के केवल चार राज्यों- राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के हिस्से ही इस वलयाकार सूर्य-ग्रहण को देख सकेंगे | जबकि आंशिक सूर्यग्रहण पूरे भारतवर्ष में दिखाई पडेगा | भारत में वलयाकार सूर्यग्रहण की शुरुआत राजस्थान के पश्चिमी छोर पर स्थित घरसाना नामक स्थान से होगी तथा वलयाकार सूर्यग्रहण की समाप्ति जोशीमठ नामक स्थान से होगी | इनके मध्य स्थित स्थानों यथा राजस्थान के अनूपगढ़, श्रीविजयनगर, सूरतगढ़, एलेनाबाद आदि स्थानों, हरियाणा के सिरसा, रतिया, जाखल, पिहोवा, कुरुक्षेत्र, लाडवा, यमुनानगर आदि स्थानों, उत्तर प्रदेश के बेहट नामक स्थान तथा उत्तराखण्ड के देहरादून, चम्बा, टिहरी, अगस्त्यमुनि, चमोली, गोपेश्वर, पीपलकोटी, तपोवन आदि स्थानों से ही वलयाकार सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा |

आंशिक सूर्यग्रहण भारत में कहाँ  कहाँ दिखेगा ?

आंशिक सूर्यग्रहण अलग-अलग आकर में भारतवर्ष के सभी स्थानों से देखा जा सकेगा | अपने स्थानभेद के अनुसार सूर्यग्रहण का समय सभी स्थानों के लिए अलग अलग होगा |

विश्व में यह ग्रहण कहाँ कहाँ दिखेगा -

यह कंकण सूर्यग्रहण विश्व में मध्य-अफ्रीका, कांगो, इथियोपिया, यमन, सऊदी अरबिया, ओमान, पाकिस्तान, चीन, ताइवान, दक्षिण-प्रशान्त महासागर, हिन्द महासागर और भारतवर्ष के संपूर्ण क्षेत्र में दिखलाई पड़ेगा। खण्डसूर्य ग्रहण के रूप में इसका प्रारम्भ दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी समुद्री सीमा से सूर्योदय के समय होगा | यहाँ खण्डग्रहण का मध्य तथा मोक्ष दृश्य होगा | मध्य अफ्रीका से फिलीपिन्स द्वीप समूह के सुदूर पूर्वोत्तर क्षेत्र में खण्डसूर्यग्रहण का स्पर्श मध्य तथा मोक्ष दृश्य होगा | खण्डसूर्यग्रहण का स्पर्श तथा मोक्ष पापुआ न्यूगिनि तथा प्रशान्त महासागर के समुद्री क्षेत्र में दृश्य होगा | कंकणाकृति सूर्यग्रहण का प्रारम्भ अफ्रीका के कांगो क्षेत्र में सूर्योदय के समय होगा जो कि मध्य अफ्रीका, अरब क्षेत्र, उत्तरी भारत तथा एशिया आदि देशों में दिखाई देगा | प्रशान्त महासागर के समुद्री क्षेत्र में सूर्यास्त के समय कंकणाकृति सूर्यग्रहण का मोक्ष होगा |


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ग्रहण का मान -

भारतवर्ष के उत्तरी क्षेत्र में यह सूर्य ग्रहण 69% से 98.97% तक दिखलाई पड़ेगा वहीं दक्षिणी क्षेत्रों में सूर्य ग्रहण 23% से 50.25% के आसपास दिखलाई पड़ेगा । दिल्ली में 93.77%, मुम्बई में 62.10%, कलकत्ता में 65.52% और चेन्नई में 34.23% ग्रहण ग्रास नजर आएगा |
इस ग्रहण की वलयाकारिता अवधि बहुत कम है | उत्तर भारत के अमलोहा (हरियाणा) तथा तलवार खुर्द (हरियाणा) में इस सूर्य ग्रहण की कुण्डलाकार या वलयाकार आकृति सबसे लम्बे समय तक यानि अधिकतम 33 सेकंड तक दिखलाई देगी | यह अपने आप में खगोल शास्त्रियों और ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए बहुत ही रोमांचक और ऐतिहासिक खगोलीय घटना होगी। विज्ञान प्रसार नेटवर्क(VIPNET) तथा ज्योतिर्विद्या परिसंस्था पुणे के वैज्ञानिकों की पूरी टीम इस खगोलीय घटना की साक्षी बनने के लिए हरियाणा जाने वाली थी | परन्तु इस वैश्विक आपदा के कारण इस योजना को विराम देना पड़ा | इस ग्रहण को सबलोग अपने अपने स्थानों से ही देखेंगे |

ग्रहण का समय -

आप सबको पता ही है और मैंने ऊपर बताया भी है की सूर्यग्रहण का समय स्थानभेद से अलग-अलग से होता है ! ऐसा क्यों होता है, इस पर हम इसी लेख में आगे चर्चा करेंगे | भारतवर्ष में खण्ड सूर्यग्रहण की शुरुआत 09:16 a.m से होगी तथा खण्ड सूर्यग्रहण की समाप्ति 03:14 p.m पर होगी | इसी समय के बीच में अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग समय पर वलयाकार या खण्ड सूर्यग्रहण की दृश्यता रहेगी |


राँची के लिए ग्रहण का समय-

राँची में वलयाकार सूर्यग्रहण दृश्य नहीं है | राँची में आप खण्ड सूर्यग्रहण ही देख पाएँगे | राँची में ग्रहण का समय निम्नलिखित रहेगा-
सूर्य-ग्रहण - 21 जून 2020
ग्रहण प्रारम्भ : 10:36 AM
ग्रहण मध्य : 12:25 AM
ग्रहण समाप्ति: 14:09 AM
राँची के लिए सूतक प्रारम्भ: 20 जून रात्रि 10:35p.m से |


आप निम्नलिखित वेबसाइट पर जाकर अपने स्थान का सही ग्रहण-समय जान सकते हैं-
https://www.timeanddate.com/eclipse/in/india/ranchi



ग्रहण समाप्ति कब ? 3 बजे के आस पास या शाम 7 बजे के आस पास ?

बहुत सारे लोग इस प्रश्न पर भ्रमित हैं क्योंकि पंचांग में ग्रहण समाप्ति केवल 03:05pm के आस-पास दिया है। लेकिन इन्टरनेट आदि में ग्रहण समाप्ति का समय 6:39pm के आस पास दिया है। ऐसे में लोग भ्रमित हैं किस समय को ग्रहण समाप्ति का समय माना जाए? मेरे what's app और मैसेंजर पर अनेकों लोगों के प्रश्न भरे पड़े हैं। आप सबको इस प्रश्न का एक साथ ही उत्तर देना चाहूँगा कि धरती पर ग्रहण का प्रारम्भ दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी समुद्री सीमा में सूर्योदय के समय से हो रहा है और ग्रहण की समाप्ति प्रशान्त महासागर के समुद्री क्षेत्र में सूर्यास्त के समय पर हो रहा है। यह वैश्विक सन्दर्भ में ग्रहण का प्रारम्भ और अन्त समय है। लेकिन धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार ग्रहण दृश्यफल को धारण करता है। अर्थात् जिस स्थान पर ग्रहण दिखेगा वहीं उसके नियमानुशासन लागू होंगे और जब तक दिखेगा तब तक ही लागू रहेंगे। भारतवर्ष में ग्रहण का स्पर्श 09:16 am के आसपास और मोक्ष 03:14 pm के आस पास होगा। इसलिए हम भारतवासियों के लिए 03:14 pm बजे ग्रहण समाप्त हो जाएगा। 03:15 बजे से ग्रहण संबंधी स्नान-दान के पश्चात् हमलोग अपने दैनिक रूटिन को फोलो कर सकते हैं ।

चन्द्र ग्रहण की तरह सूर्यग्रहण भी पूरी पृथ्वी पर एक साथ क्यों नहीं दिखता ?

इस प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए हमें ग्रहण के कुछ बारीक तथ्यों को ठीक से समझना पड़ेगा। इसके लिए आइए सर्वप्रथम हम यह जाने कि ग्रहण क्या है?

ग्रहण क्या है

किसी आकाशीय पिंड का किसी अन्य आकाशीय पिंड से ढ़क जाना ग्रहण कहलाता है। हम पृथ्वीवासी यहां से हर वर्ष सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण देखते हैं।
सूर्य ग्रहण में चंद्रमा छादक और चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया छादिका होती है। चंद्रमा द्वारा किसी अन्य ग्रह को ढकने की प्रक्रिया चंद्र समागम या Occultation कहलाती है।
ग्रहण तभी लगता है जब छाद्य(सूर्य/चन्द्रमा) और छादक(चन्द्र/भूच्छाया) एक सरल रेखा में हों अर्थात् ज्योतिषीय भाषा में छाद्य छादक के पूर्वापर और याम्योत्तर अंतर का अभाव हो जाए तथा छाद्य पात(राहु/केतु) के सन्निकट हो।
सूर्य को एक पात से गुजरने के पश्चात उसी पात पर पुनः आने में 346.62 दिन लगते हैं। इसे ही ग्रहण वर्ष कहा जाता है। पातों की संख्या दो होने के कारण इनके आधे दिन अर्थात 173.31 दिनों में सूर्य किसी न किसी पात पर आता है। एक ग्रहण से दूसरे ग्रहण की संभावना 176.68 दिनों के बाद ही बनती है।

चन्द्र ग्रहण  कैसे होता है

पूर्णिमा(पूर्वापर अन्तर) के दिन शराभाव (चन्द्रग्रहण में शराभाव याम्योत्तर अन्तर होता है।) होने पर चन्द्रग्रहण होता है। #शर क्या है? शर को इंग्लिश में Celestial Latitude कहते हैं। शर सिद्धांत ज्योतिष् का तकनीकी शब्द है। कदम्बप्रोत वृत्त में ग्रहबिम्ब और ग्रहस्थान का अन्तर शर कहलाता है। शर के अभाव को शराभाव कहते हैं । हर बार चन्द्र+राहु/केतु रहने पर पूर्णिमा के दिन चन्द्रग्रहण नहीं होता, बल्कि इनके साथ-साथ जब शराभाव होता है तभी चन्द्रग्रहण होता है। अगर शराभाव की बात न होती तो हर पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण क्यों नहीं लगता?
चलिए इसी क्रम में लगे हाथों शर निकालने का सूत्र भी बता देता हूँ। #शरानयनम्- स्पष्ट चन्द्र में पात को घटाकर जो शेष बचे उसकी जीवा निकालकर उसे चन्द्रमा के परम विक्षेप (२७०' कला) से गुणा करके त्रिज्या (३४३८ कला) से भाग देने पर लब्धि कलादि स्पष्टशर प्राप्त होता है।
चंद्रग्रहण के संबंध में एक अति #महत्त्वपूर्ण बात आपको बताता हुँ। ऊपर यह बताया जा चुका है कि जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है तो चन्द्रग्रहण होता है। चंद्रमा अन्य ग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी के बहुत नजदीक है। और चन्द्रमा का भ्रमण वृत्त पृथ्वी के वृत्त पर स्थित है। चन्द्रमा पर पड़ने वाली भूच्छाया से हमारा सीधा संबंध है क्योंकि हम स्वयं पृथ्वी पर निवास करते हैं। इसलिए चंद्रमा पर पढ़ने वाली पृथ्वी की छाया पूरी पृथ्वी से देखने पर एक समान ही दिखाई पड़ती है। अर्थात चंद्रग्रहण #सार्वभौमिक होता है, और सरल शब्दों में कहूं तो जिस दिन चंद्रग्रहण होगा उस दिन पूरी पृथ्वी पर जहां-जहां रात होगी सभी स्थानों पर समान रूप से चंद्रग्रहण दिखाई देगा।
सूर्य ग्रहण में ऐसा नहीं होता, सूर्यग्रहण सार्वभौमिक नहीं है। अब आइए सूर्य ग्रहण को ठीक से समझते हैं।

 सूर्यग्रहण_कैसे_होता_है?

अमावस्या(पूर्वापरान्तराभाव) के दिन लम्बन और नति (सूर्यग्रहण में याम्योत्तर अन्तर लम्बन और नति संस्कार से ज्ञात होता है।) का अभाव रहने पर सूर्य ग्रहण होता है। लम्बन को अंग्रेजी में Parallax कहते हैं। भूपृष्ठीय ग्रह भूकेंद्रीय ग्रह की तुलना में जितना लंबित होता है वही लंबन कहलाता है। शरों के अंतर को नति कहते हैं। लंबन और नति का मान अक्षांश भेद से बदल जाता है, साथ ही सूर्य हमसे बहुत ज्यादा दूरी पर स्थित है। सूर्य बिंब को चंद्र बिंब द्वारा ढक लिए जाने पर सूर्यग्रहण होता है। चंद्र बिंब से हमारा सीधा संबंध नहीं है और चंद्रमा तथा सूर्य के भ्रमण वृत्तों के बीच बहुत दूरी है, चंद्र का बिंब सूर्य बिंब से छोटा भी है। इन सभी कारणों से पूरी पृथ्वी से सूर्य ग्रहण समान रूप से दिखाई नहीं देता, बल्कि सूर्य ग्रहण का समय पूरी पृथ्वी के लिए अलग-अलग होता है और उसका समय भी स्थानभेद से बदलता रहता है। अर्थात् सूर्यग्रहण चंद्रग्रहण की भांति #सार्वभौमिक नहीं होता। सूर्यग्रहण मात्र 10000 किलोमीटर लंबाई और 250 किलोमीटर चौड़ाई के क्षेत्र तक में ही एक बार में दिखाई देता है।
इसी क्रम में आइए सूर्यग्रहण से जुड़ी अत्यंत #महत्वपूर्ण और #रोचक जानकारी आपको बताता हूँ। ऐसा नहीं है की केवल चंद्र बिंब की छाया पढ़ने पर ही सूर्य ग्रहण होता है बल्कि अन्य आंतरिक ग्रहों अर्थात बुध और शुक्र बिंब की छाया पढ़ने पर भी सूर्य ग्रहण होता है। परंतु इनका बिंब पृथ्वी से बहुत छोटा दिखाई पड़ने के कारण हम इसे ग्रहण नहीं कहते, बल्कि इसे बुध का #पारगमन और शुक्र का #पारगमन नाम से जानते हैं। बुध और शुक्र का पारगमन सदी की बहुत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है, यह बहुत कम ही देखने को मिलती है। 2012 में #शुक्र का पारगमन हुआ था जिसे #मैंने अपने गुरु जी आदरणीय श्री #वैद्यनाथ मिश्र गुरुजी के आशीर्वाद से उनके और कुछ खगोल वैज्ञानिकों के साथ देखा था। इस सदी में अब शुक्र का पारगमन दिखाई नहीं देगा।

इस_ग्रहण_की_विशेषता -

1. यह इस दशक का अन्तिम कंकण सूर्यग्रहण (Annular Eclipse) है।
2. ऐसा कंकण सूर्यग्रहण इस दशक में अब भारतवर्ष में नहीं दिखाई देगा।
3. वैज्ञानिकों ने इस सूर्य ग्रहण को रिंग ऑफ फायर नाम दिया है।
4. सूर्य ग्रहण का सम्पूर्ण मान 5 घंटे 58 मिनट होगा।
5. इसका मैग्निट्यूड़ 0.994 होगा।
6. विभिन्न क्षेत्रों में सूर्य का 23% से 99% भाग चन्द्रच्छाया द्वारा ग्रसित नजर आएगा, चन्द्रमा अपने शीघ्रोच्च स्थान के नजदीक होगा।
7. यह सूर्यग्रहण सारोस चक्र में 137वें क्रमांक का सूर्यग्रहण है।
8. भारत में दृश्य कंकण सू्र्यग्रहण 55 वर्ष पूर्व 23 नवम्बर 1965 के बाद 26 दिसम्बर 2019 को हुआ था और अब अभी हो रहा है ।
9. इस वर्ष मिथुन राशि के मृगशिरा नक्षत्र में 4 ग्रहों की युति के साथ सूर्यग्रहण की घटना बहुत ऐतिहासिक है |
10. इस वर्ष का यह ग्रहण चूड़ामणि योग वाला होने से धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से बहुत ज्यादा महत्त्व वाला है |

 ग्रहण_सूतक-

यह सूर्यग्रहण पुरे भारत में दिखाई देगा !
इस दौरान जप -तप और दान का विशेष महत्व होगा !
धर्मशास्त्रों के अनुसार चन्द्रग्रहण में ग्रहण से 9 घण्टे पहले और सूर्यग्रहण में ग्रहण से 12 घण्टे पहले ग्रहण सूतक लगता है। इसमें शिशु, अतिवृद्ध और गम्भीर रोगी को छोड़कर अन्य लोगों के लिए भोजन और मल-मूत्र त्याग वर्जित है।
कहा भी गया है-
सूर्यग्रहेतुनाश्नीयात्पूर्वंयामचतुष्टयम्
चन्द्रग्रहेतुयामास्त्रीन्_बालवृद्धातुरैर्विना।।

सभी सनातनियों को इस धर्मशास्त्रीय आदेश का पालन करते हुए, सूतक के समय से ही ग्रहण के सभी नियमों का पालन करना चाहिए।

 विभिन्न_राशियों_पर_ग्रहण_का_प्रभाव-

मुहूर्तचिन्तामणि ग्रन्थ के अनुसार इस ग्रहण का 12 राशियों पर जो प्रभाव होगा उसे वर्णित किया जा रहा है -
1. मेष- लाभ ।
2. वृष- विघ्न ।
3. मिथुन- दुर्घटना ।
4. कर्क- हानि ।
5. सिंह- शोभावृद्धि ।
6. कन्या- मनोव्यथा ।
7. तुला- चिन्ता ।
8. वृश्चिक- सुख ।
9. धनु- दम्पति की अस्वस्थता ।
10. मकर- मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्ट ।
11. कुम्भ- मानहानि ।
12. मीन- सुख ।

* मिथुन राशि में ही सूर्यग्रहण लग रहा है इसलिए मिथुन राशि वालों को सबसे ज्यादा सचेत रहने की जरुरत है | उसमें भी अगर आपका जन्म मृगशिरा नक्षत्र में हुआ है तब तो ये बहुत विनाशकारी है, अतः शान्ति उपाय करने और सावधान रहने की विशेष आवश्यकता है |
जिन राशियों के लिए अनिष्ट फल कहा गया है, उन्हें ग्रहण नहीं देखना चाहिए ।
अनिष्टप्रद_ग्रहण_फलों_के #निवारण के लिए स्वर्ण निर्मित सर्प कांसे के बर्तन में तील, वस्त्र एवं दक्षिणा के साथ श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान करना चाहिए । अथवा अपनी शक्ति के अनुसार सोने या चाँदी का ग्रहबिम्ब बनाकर ग्रहण जनित अशुभ फल निवारण हेतु दान करना चाहिए। ग्रहण दोष निवारण के लिए विशेषकर गौ, भूमि अथवा सुवर्ण का दान दैवज्ञ के लिए करना चाहिए।
दान करते समय ये श्लोक पढ़ें-
तमोमयमहाभीमसोमसूर्यविमर्दन,
हेमनागप्रदानेनममशान्तिप्रदोभव।
विधुन्तुदनमस्तुभ्यंसिंहाकानन्दनाच्युताम्,
दानेनानेननागस्यरक्षमां_वेधनाद्भयात्।।
इस प्रकार दान करने से निश्चय ही ग्रहण जनित अशुभ से अशुभ फलों का भी शमन हो जाता है और उसके दुष्प्रभावों से व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है।

ग्रहण के समय क्या करें क्या न करें?

1. चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है।
2. श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत को पी लें। ऐसा करने से वे मेधा (धारणाशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाकसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं।
3. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। अतः सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर ( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर ही भोजन करना चाहिए।
4. ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। इसलिए घर में रखे सभी अनाज और सूखे अथवा कच्चे खाद्य पदार्थों में ग्रहण सुतक से पूर्व ही तुलसी या कुश रख देना चाहिए। जबकि पके हुए अन्न का अवश्य त्याग कर देना चाहिए। उसे किसी पशु या जीव-जन्तु को खिलाकर, पुनः नया भोजन बनाना चाहिए।
5. ग्रहण वेध के प्रारम्भ होने से पूर्व अर्थात् सूतक काल में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक तो बिलकुल भी अन्न या जल नहीं लेना चाहिए।
6.ग्रहण के समय एकान्त मे नदी के तट पर या तीर्थो मे गंगा आदि पवित्र स्थल मे रहकर जप पाठ सर्वोत्तम माना गया है ।
7. ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल(वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं। ग्रहण समाप्ति के बाद तीर्थ में स्नान का विशेष फल है। ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए।
8. ग्रहण समाप्ति पर स्नान के पश्चात् ग्रह के सम्पूर्ण बिम्ब का दर्शन करें, प्रणाम करें और अर्ध्य दें।उसके बाद सदक्षिणा अन्नदान अवश्य करें।
9. ग्रहण समाप्ति स्नान के पश्चात सोना आदि दिव्य धातुओं का दान बहुत फलदायी माना जाता है और कठिन पापों को भी नष्ट कर देता है। इस समय किया गया कोई भी दान अक्षय होकर कई गुना फल प्रदान करता है।
10. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु दान करने से अनेक गुना पुण्य फल प्राप्त होता है।
11. ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।
12. ग्रहण काल मे सोना मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन – ये सब कार्य वर्जित हैं।
13. ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है।
14. ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण)
15. गर्भवती महिलाओं तथा नवप्रसुताओं को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। सुतक के समय से ही ग्रहण के यथाशक्ति नियमों का अनुशासन पूर्वक पालन करना चाहिए।उनके लिए बेहतर यही होगा कि घर से बाहर न निकलें और अपने कमरे में एक तुलसी का गमला रखें।
16. ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाएँ श्रीमद्भागवद् पुराणोक्त गर्भरक्षामन्त्र-
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते ।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ॥
अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो ।
कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम् ॥
का अनवरत मन ही मन पाठ करती रहें।
17. भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। इसी प्रकार गंगा स्नान का फल भी चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना होता है।
18. ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।
19. ग्रहण के दौरान भगवान के विग्रह को स्पर्श न करे।
20. ग्रहण के समय ईष्टमन्त्रों की सरलता से सिद्धि प्राप्त हो जाती है, अतः अपने गुरु से अपने अभिष्ट मन्त्र लेकर उनके सानिध्य में ग्रहण के दौरान मन्त्र-सिद्धि भी कर सकते हैं। शाबर मन्त्र ग्रहण के दौरान गंगातट पर 10,000 जपने से सिद्ध हो जाते हैं।
21. अपने राशि पर पड़ने वाले ग्रहण के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए ग्रहण के दौरान अपने राशिस्वामि का मन्त्र या सूर्य नारायण अथवा चन्द्रदेव के मन्त्र का जप करना बहुत प्रभावी होगा |
22. रविवार के दिन सूर्यसंक्रान्ति और सूर्य अथवा चन्द्रग्रहण में रविवार होने पर उस दिन पुत्रवान गृहस्थ को पारण एवं उपवास नहीं करना चाहिए।
23. सूर्य पूराण में आया है की रविवार को सूर्य ग्रहण होने पर चूड़ामणि योग होता है | चूड़ामणि योग में होने वाला ग्रहण बहुत महत्त्व का है | इस ग्रहण में किए गए स्नानदानादि का फल अन्य ग्रहणों की अपेक्षा करोडगुना ज्यादा मिलता है |
कहा गया है-
अन्यवारे यदा भनोरिन्दोर्वा ग्रहणं भवेत् |
                            तत्फलं कोटिगुणितं ज्ञेयं चूडामणौ ग्रहे ||         - सूर्य-पुराण


ग्रहण को कैसे देखें?

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ज्योतिषियों, खगोलशास्त्रियों और वैज्ञानिकों के अलावा सामान्य जनमानस में भी ग्रहण को देखने की विशेष जिज्ञासा रहती है। खासकर छात्रों में यह उत्कण्ठा विशेषरूप से देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कैसे हम 21 जून को लगने वाले सूर्यग्रहण का आनन्द ले सकते हैं।
1. ग्रहण को देखने के लिए पर्याप्त नेत्र सुरक्षा का ध्यान रखें साथ ही वैज्ञानिकों के द्वारा निर्देशित सूर्य ग्रहण चश्मा का ही प्रयोग करें ।
2. ग्रहण को कभी भी खुली आंखों से ना देखें ।
3. टकटकी लगाकर ग्रहण न देखें, पलकें झपकातें रहें।
4. खुले मैदान में साफ आसमान के नीचे खड़े होकर आप ग्रहण देख सकते हैं।
5. गणित ज्योतिष् के अध्येता और एस्ट्रोनामि के विद्यार्थी और खगोल वैज्ञानिक ग्रहण को विशेष तौर पर आब्जर्व करते हैं।
6. पिन होल कैमरों या अन्य किसी साधन की मदद से किसी परदे पर सूर्य की छाया लेकर आसानी से सूर्यग्रहण देखा जा सकता है |

- पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"
B.H.U, वाराणसी।