Search This Blog

Showing posts with label उपाय. Show all posts
Showing posts with label उपाय. Show all posts

Friday, 4 August 2023

संतानगोपाल प्रयोग

 संतानगोपाल प्रयोग


संतान गोपाल प्रयोग अत्यंत तीक्ष्ण प्रयोग है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग इसकी विधि ठीक से नहीं जानते। कुछ लोग मात्र एक दो महीना प्रयोग करते हैं  और परिणाम चाहते हैं। कुछ लोग अनेक तरह के पापकर्म यथा भ्रष्टाचार, दुराचार, अनाचार भी करते हैं और चाहते हैं कि केवल मंत्र जप से संतान हो जाए। सन्तान की प्राप्ति तो पूर्व जन्म के प्रारब्ध से ही होनी है। लेकिन उस प्रारब्ध को भी कभी कभी हम क्रियमाण कर्मों के द्वारा प्रतिबन्धित कर देते हैं। वह क्रियमाण कर्म कभी तन में कभी मन में तो कभी धन में विकृति लाता है जिसके कारण हम संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। कभी कभी तो संतान सुख में कुछ सामान्य या निर्बल प्रारब्ध हेतु होते हैं। इस प्रकार संतान प्रतिबन्धक प्रबल प्रारब्ध से रहित सात्विक भगवद्भक्त लोगों के लिए सनत्कुमारोक्त संतानगोपाल प्रयोग की विधि का उद्धाटन किया जा रहा है। वैसे तो संतान गोपाल के कई मंत्र प्रचलित हैं और सभी प्रभावी हैं लेकिन अपनी गुरुपरम्परा से प्राप्त सनत्कुमारोक्त संतानगोपाल मंत्र की विधि का ही मैं यहाँ उल्लेख करुँगा। 






साधन - इस प्रयोग को करने के लिए आपको गीताप्रेस से प्रकाशित #संतानगोपालस्तोत्र ग्रन्थ क्रय कर लेनी चाहिए। इस ग्रन्थ का निःशुल्क pdf प्राप्त करने के लिए आप हमारे हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान के नं. पर What's app कर सकते हैं। 


आप निम्नलिखित लिंक के द्वारा भी संतानगोपालस्तोत्र की निःशुल्क पीडिएफ प्राप्त कर सकते हैं -

संतानगोपालस्तोत्र - Download


भगवान_का_स्वरुप_या_चित्र

सनत्कुमारोक्त संतानगोपाल मंत्र की विधि में जिस ध्यान मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है -

शङ्खचक्रगदापद्मं_धारयन्तं_जनार्दनम् । 

अङ्के_शयानं_देवक्याः_सूतिकामन्दिरे_शुभे ॥ 

एवं_रूपं_सदा_कृष्णं_सुतार्थं_भावयेत्_सुधीः ॥

अर्थात् - उत्तम बुद्धिवाला साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये सदा ऐसे रूपवाले जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो मंगलमय सूतिकागारमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये देवकीके अंकमें शयन करते हैं ।





नोट_1- पूजन के लिए भगवान के उक्त स्वरुप का प्रयोग एवं ध्यान करना चाहिए। बीच बीच में भगवान् के जन्म की कथा बार बार सुननी चाहिए। भगवान् का सूतिकागार तो जेल ही है जहाँ भगवान का जन्म हुआ था। अंक मतलब गोद, देवकी के गोद में भगवान जेल में ही थे बाद में तो यशोदा के पास चले गए। संतान गोपाल के चार प्रयोग हैं सभी में इसी स्वरुप का ध्यान करने को कहा गया है।


नोट_2- भगवान के इस स्वरुप का छायाचित्र निःशुल्क प्राप्त करने के लिए आप हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान के  नं. पर What's app कर सकते हैं।





अनुष्ठान_विधि


* ध्यान रहे यह प्रयोग एक वर्ष का है, अतः निर्विघ्नता पूर्वक एकवर्ष पर्यन्त इसका अनुष्ठान करें।


* पति पत्नी दोनों वर्षपर्यन्त सात्विक दिनचर्या अपनाएँ सदाचार पूर्वक रहें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। 


* स्त्रियाँ मासिक धर्म के नियमों का पूर्णतः पालन करें।


* पति या पत्नी दोनों में से कोई भी इस अनुष्ठान को कर सकते हैं।


* स्त्री अपने पति से अनुमति लेकर ही इस अनुष्ठान को करे। जब अनुष्ठान के दौरान मासिक चक्र के कारण अवरोध हो उस दौरान पति इसे पूरा करे। 


* इस प्रयोग में पहले संतान गोपाल मंत्र का 10 माला जप करना चाहिए।


* इसलिए पहले जप विधि बता रहे हैं। जप विधि संतानगोपालस्तोत्र ग्रन्थ के पेज नं. 18 में दी हुई है। 


* सिर्फ एक पृष्ठ की विधि है, उसको ही करना है। उसके अगले पेज पर उद्यापन की विधि है, वह प्रयोग तो जब उद्यापन करेंगे तब करना है। 


* सर्वप्रथम भगवान को जल, चन्दन, पुष्प या पुष्पमाला, धूप, दीप एवं नैवेद्य अर्पित करें।


* उसके बाद विनियोग मंत्र पढ़ कर जमीन या किसी प्लेट पर जल गिराएँ। 


* स्त्रियों को अंगन्यास करने की आवश्यकता नहीं है। 


* इसके बाद ध्यान करें ।


* ध्यान करने के बाद 10 माला जप करें, मंत्र ग्रन्थ में लिखा है। 


* जप के लिए तुलसी, मोती, स्फटिक आदि मालाएँ प्रयोग कर सकते हैं।


* जप के बाद जप भगवान को समर्पित करें।


* फिर संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करें। जो ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या 22 से 40 में वर्णित है।


* जप से पूर्व अखण्ड दीप जला लें जो पूरे प्रयोग तक जलता रहे।


* अन्त में आरती करें, क्षमा याचना, प्रदक्षिणा करें, प्रणाम करें।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Mob.- +91 9341014225.



Tuesday, 23 August 2022

दाम्पत्य सुख बढ़ाने वाला अद्भुत् मन्त्र

 दाम्पत्य सुख बढ़ाने वाला अद्भुत् मन्त्र


यदि आप भी पति-पत्नी के बीच कलह से परेशान हैं, वैमनस्य बढ़ रहा है, विचार नहीं मिल रहे हैं अथवा तलाक की नौबत आ रही है या जन्मकुंड़ली में दाम्पत्य सुख का योग  कम है, यदि जीवनसाथी अल्पायु है अथवा जीवनसाथी कुमार्ग का आश्रय ले रहा है तो आपको इस अद्भुत मन्त्र का जप अवश्य ही करना चाहिए। 

यह मन्त्रजप पति या पत्नी अथवा दोनों मिलकर भी कर सकते हैं। इसका जप बहुत सरल है लेकिन इसका प्रभाव स्थायी, दूरगामी और चमत्कृत करने वाला है। 


श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीधामन् श्रीपतेऽव्यय ।

गार्हस्थ्यं  मा  प्रणाशं  मे  यातु  धर्मार्थकामदम् ।।

अर्थ - हे श्रीवत्सचिन्ह धारण करने वाले ! हे लक्ष्मीपति ! हे लक्ष्मीनिवास ! हे लक्ष्मी के स्वामी ! हे अव्यय ! (कभी विनाश को प्राप्त न होने वाले) मेरे गृहस्थाश्रम का नाश कभी न हो । यह गृहस्थाश्रम मुझे धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि कराने वाला बन जाए। 





सन्दर्भ - आप इसकी महिमा का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि यह श्लोक मात्र एक स्थान पर नहीं बल्कि कई पुराणों और संहिताओं में उद्धृत है। आइए कुछ सन्दर्भ देखते हैं - 

इस श्लोक का वर्णन भविष्य पुराण के ब्रह्मपर्व में प्राप्त होता है।  पुनश्च मत्स्यपुराण के 71वें अध्याय के पाँचवें श्लोक में भी यह प्राप्त होता है। पुनश्च अग्निपुराण के 177 वें अध्याय श्लो. 4-5 में यह उद्धृत है। धुरन्धर संहिता सप्तम पटल श्लोक 50 में भी यह श्लोक प्रस्तुत है। साथ ही कुछ भेद के साथ लक्ष्मीनारायण संहिता प्रथम खण्ड  अध्याय 267 में भी यह उद्धृत है। 


प्रयोग विधि - 

* सामान्य समस्या में इस श्लोक का प्रतिदिन एकमाला जप करें ।


* विकट समस्या में उक्त मंत्र का ब्राह्मणों के द्वारा 10 हजार जप करा लें ।


* उत्कट परिस्थिति में एक लाख जप कराएँ और नियमित एक या दस माला स्वयं भी जप करें। 


मैंने अपने कई परिचितों को इसका प्रयोग कराया है और वे इससे बहुत लाभान्वित हुए हैं। इसलिए पूर्णतः आश्वस्त होकर व्यक्तिगत स्तर पर परीक्षित प्रमाणित श्लोक जनकल्याण की भावना से उजागर कर रहा हूँ।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

Sunday, 21 August 2022

रोग निवारण मंत्र

रोग निवारण मन्त्र 


अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।

नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।।


रोग निवारण हेतु उक्त मन्त्र बहुत प्रसिद्ध और बहुत प्रभावी है। यह श्लोक इतना महत्वपूर्ण है कि कई पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है।  नारदपुराण के पूर्वार्ध में अ.34 श्लोक 61 में यह श्लोक प्राप्त होता है। पुनश्च  विष्णुधर्म (उत्तर) पुराण मे प्रथम खण्ड के अध्याय 196 श्लोक 31 में भी आया है एवं विष्णुधर्म (पूर्व) पुराण के अध्याय 28 श्लोक 39 में भी आया है। पुनश्च पद्मपुराण के उत्तरखण्ड, अध्याय 78 श्लोक 53 में भी इस श्लोक का वर्णन है। धुरन्धर संहिता के सप्तम पटल श्लोक 48 में भी यह श्लोक दिया गया है। पाण्डवगीता में भगवान् धन्वन्तरि ने भी इसे श्लोक को कहा है। पुनश्च ब्रह्माण्डपुराण में इस नामौषधास्त्र का प्रयोग भगवती ललिता ने भण्डासुर के विरुद्ध किया था। मुझे सर्वप्रथम यह श्लोक अपने दीक्षागुरुजी के श्रीमुख से प्राप्त हुआ था। 




आप इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि यह श्लोक कितना महत्वपूर्ण है। अपने स्वयं के जीवन में और परिजनों के जीवन में भी आप इसका प्रयोग कर सकते हैं। स्वास्थ्य खराब होने पर इस श्लोक का निरन्तर पाठ करना अनेकशः स्वास्थ्य वृद्धि करता देखा गया है।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

Friday, 29 March 2019

गृहक्लेश निवारण

कुछ दिन पहले किसी जिज्ञासु ने पूछा था आज कल गृहक्लेश बढ़ता जा रहा है। लोग इसका उपाय पूछते हैं। इसका प्रभावशाली शास्त्रीय उपाय क्या है?

मित्रों, गृहक्लेश का कारण हमारे छः आतंरिक शत्रुओं का अनियन्त्रित होना है। ये छः आभ्यन्तर शत्रु या विकार हैं-
1.काम
2. क्रोध
3. लोभ
4. मोह
5. मद और
6. मात्सर्य ।

आजकल कलियुग का ऐसा प्रभाव है, समय और शासन तंत्र का ऐसा कुचक्र है लोग संस्कारहीन होते जा रहे हैं। अर्मयादित जीवन शैली, अशास्त्रीय जीवन, गलत खान-पान, गैजेट्स पर बहुत ज्यादा आसक्ति आदि कारण से लोगों के अन्दर उपर्युक्त विकृतियों की बेतहाशा अभिवृद्धि देखी जा रही है।
आज के समय में धर्म-संस्कृति की मर्यादा का न तो लोगों को ज्ञान है और न ही उन्हें इसे जानने तथा पालन करने की इच्छा ही है। संस्कारहीन, अमर्यादित परिवेश में पलने बढ़ने के कारण वर्तमान पीढ़ी आचारहीन तथा पथभ्रष्ट होकर अपना अमूल्य मानव जीवन और बेसकीमती समय का का दुरुपयोग करते हुए पतन होने से अधोगति को प्राप्त हो रही है। जिससे मानव शक्ति का अवमूल्यन हो रहा है।
एक बहुत बढ़िया सुभाषित स्मरण हो आया। उक्त जिज्ञासा के सन्दर्भ में यह सुभाषित बहुत प्रासंगिक है-.

"काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।"

अर्थात्- काव्यशात्र(यह शब्द यहाँ संस्कृत वाङ्मय का उपलक्षण है।) का आनन्द लेने में बुद्धिमान व्यक्ति का समय व्यतीत होता है। लेकिन मूर्खों का समय व्यसन में निद्रा में अथवा कलह में व्यतीत होता है।

तो यह निश्चित हुआ कि गृहक्लेश निवारण का पहला उपाय है सुसंस्कृत शास्त्रसम्मत मर्यादित जीवन।
दूसरा कर्मकाण्ड़ परक बहुत प्रभावशाली उपाय है हरिनाम संकीर्तन।
यदि गृहक्लेश से बहुत परेशान हों तो हरिनाम संकीर्तन कराना चाहिए।
कहा गया है-

सर्वरोगोप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम्।
शान्तिदं सर्वऽरिष्टानां हरेर्नामानुकीर्तनम्।।

अर्थात्- भगवन्नाम संकीर्तन सभी रोगों का उपसमन करने वाला है, सभी तरह के उपद्रवों का नाश करने वाला है तथा सभी तरह के अरिष्टों की शान्ति करने वाला है।

पुनश्च-
आत्यन्तिकं व्याधिहरं जनानां,
चिकित्सितं वेदविदो वदन्ति ।
संसारतापत्रयनाशबीजं,
गोविन्द-दामोदर-माधवेति ।।

अर्थात्- वेदवेत्ताओं का कहना है कि गोविन्द-दामोदर और माधव यह भगन्नाम मनुष्यों के अत्यंत घातक रोगों का हरण वाला भेषज्(औषधि) है। यह संसार के आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक त्रिविध तापों का नाश करने वाला बीज मन्त्र है।

पुनश्च-
आधयोर्व्याधयोर्यस्य स्मरणान्नामकीर्तनात्।
तदेव विलयं यान्ति तमनन्तं नमाम्यहम् ।।

अर्थात्- जिसके स्मरण से और नाम संकीर्तन से मानसिक और शारीरिक बाधाएँ तत्काल विनष्ट हो जाती हैं, उस अनन्त को मैं प्रणाम करता हूँ।

अब यह प्रश्न हो सकता है कि नाम संकीर्तन कैसे हो???
उसके लिए आप घर के विभिन्न स्थानों में भगवान का नाम लिखें और जब जब नजर पड़े भगवान का नाम गुनगुनाते रहें।

यदि अनुष्ठान के रूप में कराना चाहें तो आप 24 घण्टे का अखण्ड़ हरिकीर्तन करा सकते हैं।
जिसके निम्नलिखित प्रकल्प हो सकते हैं-

1. अखण्ड़ रामचरितमानस पाठ
2. अखण्ड़ सुन्दरकाण्ड़ या हनुमानचालिसा पाठ
3. अखण्ड़ हरिकीर्तन इस मंत्र से
हरे राम! हरे राम! राम राम हरे हरे!
हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! कृष्ण कृष्ण हरे!

 
अथवा इस मंत्र से-
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।।

गणेश पूजन, कलश पूजन आदि करके भगन्नाम संकीर्तन पूरा करें फिर 24 घंटे के पश्चात हवन प्रसाद वितरण/भण्डारा आदि करें।

© पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"
     B.H.U., वाराणसी।