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Tuesday, 14 March 2023

मेष राशि का वार्षिक राशिफल वर्ष 2023

 

 

मेष राशि का वार्षिक राशिफल वर्ष 2023

 

यह वर्ष मेष राशि वाले जातकों के लिए मध्यमोत्तम अर्थात् मिश्रित फलदायक है। यदि शुभ फलों की ओर नजर डालें तो धन प्राप्ति के मार्ग में उपस्थित बाधायें दूर होंगी। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। धन लाभ तथा धनवृद्धि होगी लेकिन वित्तिय लेन देन में सचेत रहें। स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी कम होगी लेकिन मानसिक कष्ट संभव है, भ्रम की स्थिति बनेगी, माता के स्वास्थ्य में बाधा होगी। भूमि-भवन वाहन प्राप्ति की दिशा में चल रहे प्रयास सफल हो सकते हैं। विशेषरूप से वाहन का क्रय संभव है। आजीविका प्राप्ति की दिशा में चल रहे प्रयास तो सफल होंगे, परन्तु नौकरी पेशा वाले जातक के साथ षड़यंत्र व कपटपूर्ण आचरण होना संभव है, कार्यों में बाधा आयेगी। मेष राशि के सरकारी कर्मचारियों की व्यस्तता रहेगी। कुटुम्बीजनों का सहयोग प्राप्त होगा और शत्रुगण पराभव को प्राप्त होंगे।  अशुभ फलों में मेष राशि के छात्रवर्ग के प्रतियोगी परीक्षा परिणाम में विघ्न बाधायें उपस्थित होंगी। आलस्य व प्रमाद आपके विकास पथ पर बाधा उपस्थित करेंगे। विपरीत लिंगियों से सावधान रहेंअन्यथा सफलता में बाधा उपस्थित हो सकती है। मेष राशि के स्त्री वर्ग को विशेष कष्ट का सामना करना होगा। जीवनसाथी के चयन की दिशा में चल रहे प्रयासों में बाधायें आयेंगी। पारिवारिक तथा वैवाहिक जीवन में सकारात्मकता की कमी होगी। संतति सुख में बाधा उत्पन्न हो सकती है, लेकिन उनकी प्रगति होगी। भोगवादी प्रवृत्ति से बचें, अपने क्रोध संवेग पर पूर्ण नियन्त्रण रखेंअन्यथा प्रगति पथ से विमुख हो सकते हैं। न्यायालयीय कार्यों में कष्ट होगा। वर्ष 2023 के जनवरीमार्चजुलाई और नवम्बर मास विशेष कष्टदायी हैं। मेष राशि वालों पर इस वर्ष साढ़ेसाती या ढैया का कोई प्रभाव नहीं है। गोचर विचार में सबसे महत्वपूर्ण होता है शनि का विचार करना इस वर्ष 17 जनवरी 2023 से शनि कुम्भ राशि में गोचर कर चुके हैं और वर्षपर्यन्त इसी राशि में रहेंगे। कुम्भ राशि मेष से ग्यारहवीं राशि है। फलदीपिका नामक ग्रन्थ में मन्त्रेश्वर ने जन्मराशि से ग्यारहवीं राशि में शनिगोचर का फल इस प्रकार कहा है –

सौख्यान्येकादशस्थो बहुविधविभवप्राप्तिमुत्कृष्ट कीर्ति 

अर्थात् – जब शनि जन्मकालीन चन्द्र राशि से एकादशवीं राशि में भ्रमण करे तो शुभ फलकारक होता है। इस दौरान सब प्रकार के सुखबहुत प्रकार के वैभवउत्कृष्ट कीर्ति आदि शुभ फल होते हैं।

गोचर विचार के दौरान शनि के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह होता है बृहस्पति। क्योंकि शुभफलों की पुष्टता के लिए बृहस्पति को उत्तरदायी बताया गया है। इस वर्ष बृहस्पति मीन राशि में 21 अप्रैल 2023 तक और उसके बाद वर्षभर मेष राशि में रहेंगे। यह दोनों राशियाँ क्रमशः मेष से बारहवीं और पहली है। मंत्रेश्वर ने फलदीपिका में जन्मराशि से बारहवीं और पहली दोनों राशियों में बृहस्पति गोचर का अशुभफल ही बताया है।

जीवे जन्मनि देशनिर्गमनमप्यर्थच्युतिं शत्रुतां 

अर्थात् – यदि बृहस्पति जन्मराशि में ही गोचर करे तो देश या अपने स्थान से बाहर जानाधन का अत्यन्त व्यय या नाशशत्रुता आदि अनिष्ट फल होते हैं।

रिःफे दुःखं साध्वसं द्रव्यहेतोः ।

अर्थात् – यदि बृहस्पति जन्मराशि से बारहवीं राशि में गोचर करे तो द्रव्य सम्बन्धी दुःख तथा भयचिन्ताउद्वेग आदि अशुभ फल होते हैं 

इस प्रकार बृहस्पति के पक्ष से तो मीन राशि वालों के लिए वर्ष 2023 में अशुभता की अधिकता ही पुष्ट हो रही है।

वार्षिक राशिफल विचार में आधुनिक ज्योतिर्विद् राहु को भी विशेष महत्व देते हैं। अतः राहु का विचार भी मेष राशि के वार्षिक राशिफल के सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। राहु इस वर्ष मेष एवं मीन राशियों में रहेंगे। अक्टूबर तक राहु की स्थिति मेष राशि में रहेगी उसके बाद नवम्बर में राहु राशि परिवर्तन करके मीन राशि में आएँगे। मेष राशि मेष से प्रथम ही हैगोचर विचार ग्रन्थ में जगन्नाथ भसीन जी ने यवानाचार्य का मत हिमगोः पूजमसादेर्धनम् का कट्पयादि विधि से अर्थ करते हुए राहु के प्रथम भाव में गोचर करना भी शुभफल प्रदाता बताया है। गोचर विचार में जगन्नाथ भसीन ने राहु का चन्द्रलग्न से प्रथम भाव में गोचर का फल बताते हुए लिखा है – “राहु चन्द्र लग्न में यदि गोचरवश आ जावे तो मान में वृद्धि होधन सम्पत्ति बढ़ेपुत्रों के धन में वृद्धि हो। चूँकि राहु चन्द्र का शत्रु हैअतः मानसिक व्यथा भी हो”। इस प्रकार निष्कर्ष रुप में वार्षिक राशि फल को तीन भागों में बाँटे तो राहु एवं गुरु के कारण 40% अशुभता और राहु एवं शनि के कारण 60% शुभता रहेगी।





 

 

निष्कर्ष रुप में निम्नलिखित महत्वपूर्ण सावधानियाँ हैं -

·      दुर्घटना को लेकर सावधान रहें।

·       पत्नी-पुत्र एवं परिवार के स्वास्थ्य को लेकर सावधान रहें।

·       मानसिक अशान्ति को लेकर सावधान रहें।

·       धन के व्यवहार में सावधानी बरतें।

·       यात्रा को यथासम्भव टालने का प्रयास करें।

·       शत्रुओं से सचेत रहें।

 

अशुभ फलों के निराकरण हेतु सर्वसामान्य उपाय का निर्देश किया जा रहा है –

Ø  आवर्षान्त राहुकेतु तथा गुरु विशेष पूज्य हैं ।

Ø  नित्य विष्णुसहस्रनामस्तोत्र का पाठ अथवा श्रवण करें ।

Ø  गुरुवार को फलफूल तथा मिष्ठान का किसी धर्मस्थान में दान करें ।

Ø  भाईयों के सहयोग व सेवा एवं बड़े बुजुर्गों की सेवा से सकल मनोरथ पूर्ण होंगे।

Ø  माता-पिता एवं गुरुजनों का आशीर्वाद विशेष कल्याणदायक होगा। 


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य 

 

 

Thursday, 9 March 2023

दक्ष की 60 कन्याओं का विवाह - एक रोचक जानकारी

 

दक्ष की 60 कन्याओं का विवाह - एक रोचक जानकारी


दक्ष के कन्या संतति के संबंध में अलग अलग कल्पों के अनुसार अलग अलग पुराणों में अलग अलग कथा मिलती है जिसमें उनकी संख्या भिन्न-भिन्न बताई गई है। शिवमहापुराण और श्रीमद्भागवत्महापुराण के अनुसार  छठे मन्वन्तर में दक्षप्रजापति ने दशप्रचेतस के पुत्र के रूप में जन्म लिया और असिक्नी नामक पत्नी से उनको 60 पुत्रियाँ हुईं। जिनमें से 10 का विवाह धर्म के साथ 17  का विवाह कश्यपों के साथ 27 का विवाह चन्द्रमा के साथ 2 का विवाह कृशाश्व के साथ 2 का विवाह आंगिरस के साथ और 2 का विवाह भूत के साथ हुआ। 10+17+27+2+2+2 = 60 कन्याएँ। जिन 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ उन्हें ही हम 27 नक्षत्रों के नाम से जानते हैं। इसमें ये भी है कि चन्द्रमा का रोहिणी नक्षत्र से विशेष लगाव था। जिस कारण बाकी कन्याएँ दक्ष प्रजापति से इस बात की शिकायत करती हैं और दक्ष क्रोधित होकर चन्द्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दे देते हैं। फिर शिवजी चन्द्रमा की रक्षा करते हैं और उनके क्षय की अवधि 15 दिन की कर देते हैं जिसे हम कृष्णपक्ष के नाम से जानते हैं। साथ ही शिव जी ने उन्हें पूर्णस्वरूप प्राप्त होने का वरदान भी देते हैं। जिससे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा को अपने परमरूप को प्राप्त कर लेते हैं। रोहिणी के साथ चन्द्रमा के विशेष लगाव के पीछे का रहस्य ये है कि चन्द्रमा सभी नक्षत्रों में से रोहिणी नक्षत्र के योगतारे के सबसे नजदीक से गुजरता है कभी कभी तो अतिक्रमण भी कर देता है। योगतारा उसे कहते हैं जो किसी नक्षत्र का प्रधान तारा हो। चन्द्रमा जिस चमकदार तारे के सबसे नजदीक से होकर गुजरता है उसे उस नक्षत्र का योगतारा कहा जाता है। आशा है खगोलविज्ञान की ये रहस्यमयी जानकारी आपको रोमांचक लगी होगी।


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

Thursday, 16 February 2023

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?

 रुद्राभिषेक_से_क्या_क्या_लाभ_मिलता_है_?


शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात् आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का प्रयोग करना चाहिए इसका उसका उल्लेख शिव पुराण में किया गया है। इसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक करायें तो आपको निश्चित ही मनोवांछित लाभ मिलेगा।





श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा च यांगना।

ज्वरप्रकोपशांत्यर्थं जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च सदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेत्छिवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।


अर्थ

1.जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।

2.कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलता है।

3.दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

4.गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —   लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

5.मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि होती है।

6.तीर्थ जल से अभिषेक करने पर —मोक्ष की प्राप्ति होती है।

7.इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —बीमारी नष्ट होती है ।

8.दूध से अभिषेक करने से   —  पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण होती हैं।

9.गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।

10.शर्करा मिश्रित दूध से अभिषेक करने से — सद्बुद्धि मिलती है।

11.घी से अभिषेक करने से — वंश का विस्तार होता है।

12.सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।

13.शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करने से   — पाप क्षय होता है।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।


नोट - महाशिवरात्रि में रुद्राभिषेक कराने हेतु हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान से शीघ्र सम्पर्क करें।


ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

संस्थापक एवं महासचिव

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

शिवरात्रि में प्रहर पूजा

 शिवरात्रि में प्रहर पूजा


प्रदोष में चार पहर की पूजा के लिए समय गणना -


18 फरवरी 2023 को फाल्गुन कृष्ण प्रदोष शिवरात्रि व्रत है। इस दिन कई लोग शिवजी की प्रहर पूजा करते हैं इसे यामपूजा भी कहा जाता है । रात्रि के चारों प्रहर भगवान शिवजी का अपने कामनीय द्रव्यानुकुल पदार्थ से शिवजी का भव्य रुद्राभिषेक और पूजन किया जाता है। शिव पार्वती का श्रृंगार किया जाता है।




शिवरात्रि में प्रहर पूजा


पारण चौथे प्रहर के अन्त में करें, प्रहर पूजन के पश्चात् आरती करके प्रसाद ग्रहण करें,और पारण करें अथवा प्रातः सूर्योदय के पश्चात पारण करें।

शिवरात्रि में रात्रि जागरण और प्रहर पूजन का सर्वाधिक महत्व है।

अब प्रश्न है कि हम सही प्रहर की गणना कैसे करें ताकि चारों प्रहर का ससमय पूजन किया जा सके। तो इसके लिए मैं बहुत सरल सूत्र आपको दे रहा हूँ-

1. सूर्यास्त-सूर्योदय=दिनमान

*समय 24घन्टे में लेना है

2. 24 घन्टे-दिनमान=रात्रिमान

3. रात्रिमान/4= प्रहर काल

4. सूर्यास्त+प्रहर काल= प्रथम प्रहर

5. प्रथम प्रहर+प्रहर काल= द्वितीय प्रहर

6. द्वितीय प्रहर+प्रहर काल= तृतीय प्रहर

7. तृतीय प्रहर+प्रहर काल= चतुर्थ प्रहर


उदाहरण-

दिल्ली का सूर्योदय- 6:58

दिल्ली का सूर्यास्त- 18:12

सूत्रानुसार-

1. 18:12 - 6:58 = 11:14

2. 24:00-11:14 = 12:46

3. 12:46/4 = 03:11

4. 18:12 + 3:11 = 21:43 तक प्रथम प्रहर

5. 21:43 + 3:11 = 24:34 तक द्वितीय प्रहर

6. 24:34 + 3:11 = 27:45 (रात 03:45) तक तृतीय प्रहर

7. 27:45 + 3:11 = 30:56 (सुबह 6:56) तक चतुर्थ प्रहर


इस प्रकार अपने स्थान के सूर्योदय-सूर्यास्त के हिसाब से गणना करके या मोटे तौर पर दिल्ली की गणना के आधार पर आप प्रहर पूजा कर सकते हैं।

वैसे तो सूर्योदय सूर्यास्त सभी पंचागों में दिया रहता है। बहुत सारे पंचांग ऐप भी हैं जिनसे सूर्योदय सूर्यास्त का ज्ञान हो जाता है। फिर भी अपने स्थान का सूर्योदय जानने के लिए आप इस website का भी प्रयोग कर सकते हैं।

https://www.timeanddate.com/sun/


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य

संस्थापक एवं महासचिव

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान

Saturday, 31 December 2022

बाधकग्रहों पर शोधकार्य के दौरान प्राप्त अनुभव

मन की बात



बाधक ग्रह पर तथ्यों के अन्वेषण के दौरान मुझे सर्वार्थचिन्तामणि ग्रंथ अध्याय 18 श्लोक 2 मिला। इसके प्रथम पद 'क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम्' का अर्थ लगाने के लिए मैं दो दिनों तक बहुत परेशान रहा, अनेक प्रयास किए। लेकिन बहुत प्रयास करने के बाद भी ये समझ नहीं आ रहा था कि 'रागद्विशरीरभाजाम्' का क्या अर्थ किया जाए? टीकाकारों ने इसका अर्थ चर, स्थिर, द्विस्वभाव किया था। लेकिन यह कैसे संभव होगा, इस बात को लेकर मेरा मन लगातार चिन्तन कर रहा था, क्योंकि प्रकरण के अनुसार तो यही अर्थ अपेक्षित था पर यह अर्थ 'रागद्विशरीरभाजाम्' से स्पष्ट नहीं हो रहा था। खेमराज से प्रकाशित हिन्दी टीका के महान टीकाकार ने तो न जाने क्या देखकर चर, स्थिर द्विस्वभाव भी लिखा और द्विशरीरभाजाम् को  देखकर राहु-केतु भी लिखा। मतलब देखकर मन ने उनके लिए कहा- हैं तो महानै वाले। यहाँ कहीं से भी राहु-केतु न तो वर्णित है न वांछित है। पर कापी पेस्ट भी करना है और अपनी अकल भी लगानी है (जो कि है ही नहीं उनके पास) तो ऐसा ही अनर्थ होगा। इसके अलावा भी मैंने सर्वार्थचिन्तामणि की कई टीकाएँ देखीं, लेकिन संतुष्ट नहीं हुआ। फिर थक हार कर दूसरे दिन मैंने अपने परिचित् ज्योतिर्विद् मित्रों को यह श्लोक भेजा और निवेदन किया कि 'रागद्विशरीरभाजाम्' को स्पष्ट करें। कई लोगों ने तो प्रयास ही नहीं किया, कई लोगों ने कुछ बहाने बता कर मना कर दिया। एक प्रिय मित्रमणि ने कुछ प्रयास किया अर्थ लगाने का पर मैं संतुष्ट नहीं हुआ, फिर एक घंटे बाद उन्होंने ही अन्वेषण करके मुझे फोन किया और कहा यदि क्रमाच्च और रागद्विशरीरभाजाम् के बीच का स्पेस मिटा दिया जाए तो अर्थ लग जाएगा क्या??? मैंने तुरंत उनका स्पेस हटाया उनको मिलाया- 'क्रमाच्चरागद्विशरीरभाजाम्' और....... अरे... अर्थ लग गया एकदम तुरंत और सुस्पष्ट क्रमात् + चर + अग(स्थिर) + द्विशरीर (द्विस्वभाव) + भाजाम् (संज्ञकेषु) = क्रमाच्चरागद्विशरीरभाजाम्। ये क्या जादु था भई। मतलब 'मौज कर दी तन्ने बेटे मौज कर दी' वाली फिलिंग आने लगी। फिर मैंने सभी टिकाएँ चेक की लेकिन सभी टीकाकारों ने 'क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम्' स्पेस के साथ ही लिखा था। मतलब सब के सब बस यहाँ से उठा के वहाँ छापने में लगे हैं किसी एक ने गलती कर दी तो किसी ने उसको सुधारना जरूरी नहीं समझा पिष्टपेषण करते रहे और अपने अपने नाम से टीकाएँ छपवाते रहे। 


एक और अनुभव -

लगभग चार वर्ष पूर्व एक बार इस स्पेस ने मुझे और परेशान किया था। मुहूर्तचिन्तामणि की एक पंक्ति है कदास्त्रभे... मुझसे किसी ने पूछा इसका अर्थ बताइए। मैं लग गया अपने काम पर कदा + स्त्रभे लगाता रहा कोई अर्थ ही न लगे, परेशान हो गया क्या मामला है अर्थ क्यों नहीं लगता। संयोग से मैं वृंदावन में था गुरुजी के पास गया उनको दिखाया उन्होंने कुछ कहा नहीं 'गुरोस्तुमौनव्याख्यानम्'  छट से पेन उठाया और 'क-दास्त्रभे' कर दिया। अरे वाह ये क्या हो गया, अब इसका अर्थ कौन नहीं लगा पाएगा? क (ब्रह्मा) अर्थात् रोहिणी  दास्त्र (अश्विनी) भे (नक्षत्र में)। देखते देखते सेकेंडों में तुरंत समाधान हो गया,  जिसको लेकर मैं घंटों परेशान था।


बाधकग्रहों पर शोधकार्य के दौरान प्राप्त अनुभव


निष्कर्ष -

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिली, हमें इन्हीं मामलों में तो गुरु की जरूरत होती है। वो अतिरिक्त स्पेस मिटा देते हैं या आवश्यक स्पेस लगा देते हैं और हम शिष्य छिन्नसंशयाः हो जाते हैं। ज्योतिष भी समाज की इसी प्रकार तो सेवा करता है, जो उनके भाग्य में तो है लेकिन अज्ञानतावश उनका दृष्टिकोण वहाँ पहुँच नहीं पा रहा है ज्योतिष अनावश्यक स्पेस को मिटा देता है या आवश्यक स्पेस (उपाय आदि) लगा देता है, नवीन दृष्टिकोण से जो आपको प्राप्त होने के बावजूद नहीं मिल पा रहा है उसे प्राप्त करा देता है। जो ज्योतिष शास्त्र स्वयं वेद का नेत्र है वो क्या आपके जीवन का पथप्रदर्शन नहीं करेगा? निश्चित रुप से करेगा और करोडों वर्षों से करता ही आ रहा है।  

देखिए कहने को तो उक्त गलती छोटी कही जा सकती है, लेकिन कैसे उसके कारण पूरा अर्थ ही विलुप्त हो रहा था। इसलिए भास्कराचार्य जी ने ज्योतिष पढ़ने के अधिकारी बनने के लिए अनिवार्य योग्यताओं में शब्दशास्त्र (व्याकरणशास्त्र) में अतिशयेन पटुः होना लिखा है। अगर अतिशयेन पटुः होंगे तो क्रमाच्च रागद्विशरीरभाजाम् नहीं लिखेंगे। लिखा भी हो तो समझ में आ जाएगा कि इनको मिलाकरके लिखना है। यदि अतिशयेन पटु होंगे तो जबरदस्ती द्विशरीरभाजाम् का अवांछित राहु-केतु अर्थ नहीं करेंगे। 


उपसंहार -

सुधि जनों ! ज्योतिष बहुत गहन शास्त्र है। यह एक ऐसा इकलौता शास्त्र है जो सभी शास्त्रों के रक्षण पोषण में सहायता प्रदान करता है। यह शास्त्र केवल ज्योतिष शास्त्रज्ञों का ही नहीं बल्कि अन्य भी सभी शास्त्रज्ञों के योगक्षेम का वहन करने में सहायक सिद्ध होता है। यह लोकोपकारी विद्या मातृवत् हमारा रक्षण, पोषण और पालन करती है। इसलिए मैं आप सभी लोगों से करबद्ध निवेदन करता हूँ, तन्मयता से इस शास्त्र का मनन चिन्तन करें, अध्ययन करें और बहुत सावधानी पूर्वक फलादेश में प्रवृत्त हों। कदाचित् आपकी किसी गलती के कारण इस महान् शास्त्र को उपाहास का पात्र कोई न बना ले।


© ज्यौतिषाचार्य पं. ब्रजेश पाठक - Gold Medalist











Wednesday, 28 December 2022

क्या हैं राहु और केतु ?

  क्या हैं राहु और केतु ?


राहु-केतु का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में भय उत्पन्न हो जाता है। तो कई लोगों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि भला ये राहु केतु हैं क्या? विज्ञान के छात्र ये प्रश्न भी करते हैं कि यदि राहु केतु ग्रह हैं तो उनका कोई भौतिक पिण्ड क्यों दिखाई नहीं देता। इस तरह के कई सवाल लोगों के मन में अपने ग्रंथों के प्रति अनास्था का भाव उत्पन्न करते हैं । लोग अपने ऋषि मुनियों के ज्ञान को बेतुका और तुच्छ समझने लगते हैं। इन्ही कारणों से राहु-केतु संबंधी सभी प्रश्नों का जवाब आपके ज्ञानवृद्धि हेतु प्रस्तुत है।

राहु केतु की परिभाषा करते हुवे "गोल परिभाषा" नामक ग्रन्थ में कहा गया है-

विमण्डले भवृत्तस्य सम्पातः पात उच्यते।

एवं चन्द्रस्य यौ पातौ तत्राद्यौ राहुसंज्ञकः

द्वितीयः केतुसंज्ञस्तौ ग्राहकौ चन्द्रसूर्ययोः।।


ग्रहकक्षा को विमण्डल वृत्त कहा जाता है। सूर्य के विमण्डल वृत्त को क्रान्तिवृत्त या भवृत्त कहते हैं । जबकि बाकी ग्रहों के विमंडल वृत्त उनके नाम से ही पुकारे जाते हैं, यथा- चंद्र विमंडल वृत्त, भौम विमंडल वृत्त आदि। यह क्रान्तिवृत्त विमण्डल वृत्त से होकर गुजरने के कारण  विमण्डल वृत्तों को दो जगहों पर काटता है। इन्ही कटान बिंदुओं या सम्पात (पात) स्थानों में से उत्तरी कटान बिन्दु  को राहु तथा दक्षिणी सम्पात बिन्दु को केतु कहा जाता है। परंतु ज्यौतिष में जहाँ कहीं भी केवल राहु या केवल केतु शब्द का प्रयोग होता है वहाँ उनका अर्थ चंद्रमा के राहु-केतु से ही लिया जाता है। बाकि ग्रहों के पातों को उन ग्रहों के नाम से ही बुलाया जाता है, यथा- गुरु के राहु-केतु/पात, शनि के राहु-केतु/पात आदि।  चंद्रमा पृथ्वी से नजदीक है और इसके दोनों पात पृथ्वी में रह रहे जीवों को ज्यादा प्रभावित करते हुवे हमारे ऋषियों को अनुभूत हुवे हैं इसलिए ज्योतिषीय गणनाओं में चंद्रमा के पातों को विशेष महत्व दिया गया है। चंद्रमा के पातों को भी ग्रह माना गया है, जबकि इनका कोई भौतिक पिंड नहीं है।





आइये इन पातों के सम्बन्ध में कुछ विशेष तथ्य जानें- 

१. दो वृत्तों के कटान बिन्दु हमेशा आमने सामने अर्थात           180°· के अन्तर पर होते हैं।

२. राहु-केतु भी हमेशा एक दुसरे से 180° के अन्तर पर अर्थात एक दूसरे सेे छः राशियों (३०×६=१८०·) के अन्तर पर रहते हैं। 

3. इसलिए राहुस्पष्ट करने के बाद उसमे 6 राशी जोड़ने से केतुस्पष्ट हो जाता है । 

4. केतु को अलग से स्पष्ट करने की जरुरत नहीं पड़ती।

5. ये ग्रह के विपरीत दिशा में चलते हैं अर्थात वक्री रहते हैं। इनकी चाल ग्रह की तरह पूर्व से पश्चिम न होकर पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर रहती है।


आप परीक्षण के लिए किसी की भी लग्न कुण्डली को उठा कर देख सकते हैं या पञ्चांग उठा कर देख सकते हैं। यही राहु केतु सूर्य व चंद्र ग्रहण के लिए उत्तरदायी हैं। ज्यौतिष में "ग्रहणं करोतीति ग्रहः" से ग्रह की परिभाषा कही गई है अर्थात जो फलों का ग्रहण करे वो ग्रह है। उद्देश्य भिन्न-भिन्न होने से हमारे ज्यौतिष मनीषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों की ग्रह संबंधी परिभाषा अलग-अलग है । हमारी परिभाषा में चन्द्रमा ग्रह है जबकि उनकी परिभाषा में उपग्रह । ज्यौतिष में प्रधान रूप से 7 ग्रह ही माने गए हैं । राहु केतु को ज्योतिष में  केवल ग्रह नहीं बल्कि तमोग्रह/छायाग्रह कहा गया है। केवल राहु केतु ही ऐसे नहीं हैं जिन्हे ग्रह कहा गया है बल्कि गुलिक, धूम, व्यतिपात, परिवेश इन्द्रचाप, उपकेतु आदि को भी ग्रह कहा गया है परन्तु इन्हें अप्रकाश ग्रह कहते हैं। कृष्ण विवर(Black hole) भी राहु है पर ये वो राहु नहीं जो  ज्योतिष में ग्रहण किए गए हैं तथा जो सूर्य व चंद्र ग्रहण के उत्तरदायी हैं जिनकी ऊपर चर्चा की गई हैं बल्कि ये वो राहु है जिनकी संहिता ग्रन्थों में चर्चा की गई हैं। ज्यौतिष अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत ज्ञान से परिपूर्ण है जो की हमें प्रकृति के कार्यप्रणाली को समझाता भी है और ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग भी सुगम करता है। ज्यौतिषवेत्ता ब्रह्माण्ड का ज्ञान रखने के कारण ईश्वर के ज्यादा करीब होता है और संसार का कल्याण करने में भी सक्षम होता है।


-पं. ब्रजेश पाठक "ज्यौतिषाचार्य"

हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान, लोहरदगा।

Saturday, 22 October 2022

सूर्यग्रहण 25 अक्टूबर की सम्पूर्ण जानकारी

खण्डग्रास ग्रस्तास्त सूर्यग्रहण

   (Partial Solar Eclipse)


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आप सब को ज्ञात ही होगा कि कार्तिक कृष्ण अमावस्या दिन मंगलवार तदनुसार 25 अक्टूबर 2022 को भारतवर्ष में सूर्य ग्रहण लगने वाला है। आइए आज इस ग्रहण की विशेषताओं के बारे में जानते हैं साथ ही ग्रहण संबंधी कृत्याकृत्य सूतक तथा अन्य वैज्ञानिक और धर्मशास्त्रीय जानकारियां भी प्राप्त करेंगे।




 25 अक्टूबर 2022 को लगने वाला सूर्य ग्रहण खण्डग्रास सूर्यग्रहण (Partial Eclipse) है।


भारत में यह ग्रहण कहाँ कहाँ दिखाई देगा ?

25 अक्टूबर 2022 को लगने वाला खण्डग्रास सूर्यग्रहण भारत में ग्रस्तास्त सूर्यग्रहण के रूप में दिखाई देगा। यह भारत के अधिकांश भागों से देखा जा सकेगा किन्तु अंडमान निकोबार द्वीप समूह और पूर्वोत्तर के कुछ भागों जैसे - आइजोल, डिब्रुगढ़, इम्फाल, ईटानगर, कोहिमा, शिवसागर, सिलचर, तमेलांग आदि क्षेत्रों में ग्रहण नहीं देखा जा सकेगा। अन्य सभी स्थानों के लोग स्थानभेद से अपने अपने समयानुसार ग्रहण को देख सकेंगे।


विश्व में यह ग्रहण कहाँ कहाँ दिखेगा ?

यह सूर्यग्रहण विश्व में यूरोप, मध्य-पूर्व उत्तरी अफ्रिका, पश्चिमी एशिया, उत्तरी अटलांटिक महासागर, उत्तर हिन्द महासागर  और भारतवर्ष के अधिकांश क्षेत्र में दिखलाई पड़ेगा। 


भारतीय समयानुसार ग्रहण का समय 

आप सबको पता ही है और मैंने ऊपर बताया भी है की सूर्यग्रहण का समय स्थानभेद से अलग-अलग होता है ! ऐसा क्यों होता है, इस पर हम इसी लेख में आगे चर्चा करेंगे। खण्ड सूर्यग्रहण की शुरुआत 02:29 PM से होगी तथा खण्ड सूर्यग्रहण की समाप्ति 06:32 PM पर होगी, ग्रहण का मध्य 04:30 PM पर होगा। इसी समय के बीच में अलग-अलग स्थानों में अलग अलग समय पर खण्ड सूर्यग्रहण की दृश्यता रहेगी।


दिल्ली के लिए ग्रहण का समय  

दिल्ली में आप खण्ड सूर्यग्रहण  देख पाएँगे। दिल्ली में ग्रहण का समय निम्नलिखित रहेगा- 

सूर्य-ग्रहण - 25 अक्टूबर 2022

ग्रहण प्रारम्भ (स्पर्श) : 04:29 PM

ग्रहण मध्य :  05:31 PM

ग्रहण समाप्ति (मोक्ष) : 06:32 PM


* ग्रहण लगे हुए ही 05:42 PM पर सूर्यास्त हो जाएगा।

* दिल्ली के लिए सूतक का प्रारम्भ : 25 अक्टूबर सुबह 04:29 AM से होगा।


आप निम्नलिखित वेबसाइट पर जाकर अपने स्थान का सही ग्रहण-समय जान सकते हैं-

अपने शहर में ग्रहण का समय जानने के लिए यहाँ क्लिक करें


दीपावली_निर्णय 

इस वर्ष सूर्य ग्रहण कार्तिक अमावस्या को पड़ रहा है तथा दीपावली भी कार्तिक अमावस्या के दिन ही मनाई जाती है अतः दीपावली निर्णय और दीपावली संबंधी समस्त शंकाओं के निवारण के लिए यह पोस्ट पढ़ें - 

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वेबसाइट पर दीपावली निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


ग्रहण_संबंधी_महत्वपूर्ण_तकनीकी_जानकारियाँ

सूर्य स्पष्ट - 06/07°/49'/46"

चन्द्र स्पष्ट - 06/07°/49'/46"

राहु स्पष्ट - 00/19°/11'/41"

कान्ति - 0.863

सूर्य क्रान्ति - 12°10' दक्षिणा

चन्द्र क्रान्ति - 11°14' दक्षिणा

व्यगु - 316°38'

भुज - 11°42'

चन्द्र शर - 01°03' उत्तर

सूर्य गति - 61' 43"

चन्द्र गति - 813' 05"


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चन्द्रग्रहण की तरह सूर्यग्रहण भी पूरी पृथ्वी पर एक साथ क्यों नहीं दिखता ?

इस प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए हमें ग्रहण के कुछ बारीक तथ्यों को ठीक से समझना पड़ेगा। इसके लिए आइए सर्वप्रथम हम यह जाने कि ग्रहण क्या है?

ग्रहण क्या है ? - किसी आकाशीय पिंड का किसी अन्य आकाशीय पिंड से ढ़क जाना ग्रहण कहलाता है। हम पृथ्वीवासी यहां से हर वर्ष सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण देखते हैं।

सूर्य ग्रहण में चंद्रमा छादक और चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया छादिका होती है। चंद्रमा द्वारा किसी अन्य ग्रह को ढकने की प्रक्रिया चंद्र समागम या Occultation कहलाती है। 

ग्रहण तभी लगता है जब छाद्य(सूर्य/चन्द्रमा) और छादक(चन्द्र/भूच्छाया) एक सरल रेखा में हों अर्थात् ज्योतिषीय भाषा में छाद्य छादक के पूर्वापर और याम्योत्तर अंतर का अभाव हो जाए तथा छाद्य पात(राहु/केतु) के सन्निकट हो। 

सूर्य को एक पात से गुजरने के पश्चात उसी पात पर पुनः आने में 346.62 दिन लगते हैं। इसे ही ग्रहण वर्ष कहा जाता है। पातों की संख्या दो होने के कारण इनके आधे दिन अर्थात 173.31 दिनों में सूर्य किसी न किसी पात पर आता है। एक ग्रहण से दूसरे ग्रहण की संभावना 176.68 दिनों के बाद ही बनती है।

चन्द्र ग्रहण कैसे होता है ?  पूर्णिमा (पूर्वापर अन्तर) के दिन शराभाव (चन्द्रग्रहण में शराभाव याम्योत्तर अन्तर होता है।) होने पर चन्द्रग्रहण होता है। #शर क्या है? शर को इंग्लिश में Celestial Latitude कहते हैं। शर सिद्धांत ज्योतिष् का  तकनीकी शब्द है। कदम्बप्रोत वृत्त में ग्रहबिम्ब और ग्रहस्थान का अन्तर शर कहलाता है। शर के अभाव को शराभाव कहते हैं । हर बार चन्द्र+राहु/केतु रहने पर पूर्णिमा के दिन चन्द्रग्रहण नहीं होता, बल्कि इनके साथ-साथ जब शराभाव होता है तभी चन्द्रग्रहण होता है। अगर शराभाव की बात न होती तो हर पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण क्यों नहीं लगता?

चलिए इसी क्रम में लगे हाथों शर निकालने का सूत्र भी बता देता हूँ। शरानयनम्- स्पष्ट चन्द्र में पात को घटाकर जो शेष बचे उसकी जीवा निकालकर उसे चन्द्रमा के परम विक्षेप (२७०' कला) से गुणा करके त्रिज्या (३४३८ कला) से भाग देने पर लब्धि  कलादि  स्पष्टशर प्राप्त होता है।

                    चंद्रग्रहण के संबंध में एक अति #महत्त्वपूर्ण बात आपको बताता हुँ। ऊपर यह बताया जा चुका है कि जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है तो चन्द्रग्रहण होता है। चंद्रमा अन्य ग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी के बहुत नजदीक है। और चन्द्रमा का भ्रमण वृत्त पृथ्वी के वृत्त पर स्थित है। चन्द्रमा पर पड़ने वाली भूच्छाया से हमारा सीधा संबंध है क्योंकि हम स्वयं पृथ्वी पर निवास करते हैं। इसलिए चंद्रमा पर पढ़ने वाली पृथ्वी की छाया पूरी पृथ्वी से देखने पर एक समान ही दिखाई पड़ती है। अर्थात चंद्रग्रहण #सार्वभौमिक होता है, और सरल शब्दों में कहूं तो जिस दिन चंद्रग्रहण होगा उस दिन पूरी पृथ्वी पर जहां-जहां रात होगी सभी स्थानों पर समान रूप से चंद्रग्रहण दिखाई देगा।

सूर्य ग्रहण में ऐसा नहीं होता, सूर्यग्रहण सार्वभौमिक नहीं है। अब आइए सूर्य ग्रहण को ठीक से समझते हैं।


सूर्यग्रहण कैसे होता है? 

अमावस्या(पूर्वापरान्तराभाव) के दिन लम्बन और नति (सूर्यग्रहण में याम्योत्तर अन्तर लम्बन और नति संस्कार से ज्ञात होता है।) का अभाव रहने पर सूर्य ग्रहण होता है। लम्बन को अंग्रेजी में Parallax कहते हैं। भूपृष्ठीय ग्रह भूकेंद्रीय ग्रह की तुलना में जितना लंबित होता है वही लंबन कहलाता है। शरों के अंतर को नति कहते हैं। लंबन और नति का मान अक्षांश भेद से बदल जाता है, साथ ही सूर्य हमसे बहुत ज्यादा दूरी पर स्थित है। सूर्य बिंब को चंद्र बिंब द्वारा ढक लिए जाने पर सूर्यग्रहण होता है। चंद्र बिंब से हमारा सीधा संबंध नहीं है और चंद्रमा तथा सूर्य के भ्रमण वृत्तों के बीच बहुत दूरी है, चंद्र का बिंब सूर्य बिंब से छोटा भी है। इन सभी कारणों से पूरी पृथ्वी से सूर्य ग्रहण समान रूप से दिखाई नहीं देता, बल्कि सूर्य ग्रहण का समय पूरी पृथ्वी के लिए अलग-अलग होता है और उसका समय भी स्थानभेद से बदलता रहता है। अर्थात् सूर्यग्रहण चंद्रग्रहण की भांति #सार्वभौमिक नहीं होता। सूर्यग्रहण मात्र 10000 किलोमीटर लंबाई और 250 किलोमीटर चौड़ाई के क्षेत्र तक में ही एक बार में दिखाई देता है।

           इसी क्रम में आइए सूर्यग्रहण से जुड़ी अत्यंत #महत्वपूर्ण और #रोचक जानकारी आपको बताता हूँ। ऐसा नहीं है की केवल चंद्र बिंब की छाया पढ़ने पर ही सूर्य ग्रहण होता है बल्कि अन्य आंतरिक ग्रहों अर्थात बुध और शुक्र बिंब की छाया पढ़ने पर भी सूर्य ग्रहण होता है। परंतु इनका बिंब पृथ्वी से बहुत छोटा दिखाई पड़ने के कारण हम इसे ग्रहण नहीं कहते, बल्कि इसे बुध का पारगमन और शुक्र का पारगमन नाम से जानते हैं। बुध और शुक्र का पारगमन सदी की बहुत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है, यह बहुत कम ही देखने को मिलती है। 2012 में  शुक्र का पारगमन हुआ था जिसे मैंने अपने गुरु जी आदरणीय श्री वैद्यनाथ मिश्र गुरुजी के आशीर्वाद से उनके और कुछ खगोल वैज्ञानिकों के साथ देखा था। इस सदी में अब शुक्र का पारगमन दिखाई नहीं देगा।


इस ग्रहण की विशेषता -

1. यह इस वर्ष का पहला  सूर्यग्रहण है।

2. सूर्य ग्रहण का सम्पूर्ण मान 04 घंटे 04 मिनट होगा। 

3. इसका मैग्निट्यूड़ 0.862 होगा। 

4. विभिन्न क्षेत्रों में सूर्य का अधिकतम 86.2% तक का भाग चन्द्रच्छाया द्वारा ग्रसित नजर आएगा, चन्द्रमा अपने शीघ्रोच्च स्थान के नजदीक होगा।

5. यह सूर्यग्रहण सारोस चक्र में 124वें क्रमांक का सूर्यग्रहण है।

6. इस वर्ष तुला राशि के स्वाति नक्षत्र में 4 ग्रहों (सूर्य-चन्द्रमा-शुक्र-केतु) की युति के साथ सूर्यग्रहण की घटना  ऐतिहासिक है।


ग्रहण सूतक - 

यह सूर्यग्रहण पुरे भारत में दिखाई देगा !

इस दौरान जप -तप और दान का विशेष महत्व होगा !

धर्मशास्त्रों के अनुसार चन्द्रग्रहण में ग्रहण से 9 घण्टे पहले और सूर्यग्रहण में ग्रहण से 12 घण्टे पहले ग्रहण सूतक लगता है। इसमें शिशु, अतिवृद्ध और गम्भीर रोगी को छोड़कर अन्य लोगों के लिए भोजन और मल-मूत्र त्याग वर्जित है। 

कहा भी गया है-

सूर्यग्रहेतुनाश्नीयात्पूर्वंयामचतुष्टयम्।
चन्द्रग्रहेतुयामास्त्रीन्_बालवृद्धातुरैर्विना।।

सभी सनातनियों को इस धर्मशास्त्रीय आदेश का पालन करते हुए, सूतक के समय से ही ग्रहण के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 


विभिन्न राशियों पर ग्रहण का प्रभाव -

ज्योतिष के ग्रन्थों के अनुसार इस ग्रहण का 12 राशियों पर जो प्रभाव होगा उसे वर्णित किया जा रहा है -

1. मेष- स्त्रीपीड़ा ।

2. वृष- सुख । 

3. मिथुन- चिन्ता । 

4. कर्क- व्यथा ।

5. सिंह- श्रीः ।

6. कन्या- क्षति । 

7. तुला- घात ।

8. वृश्चिक- हानि ।

9. धनु- लाभ ।

10. मकर- सुख ।

11. कुम्भ- मानहानि ।

12. मीन- मृत्युतुल्य कष्ट।


* तुला राशि में ही सूर्यग्रहण लग रहा है इसलिए तुला राशि वालों को सबसे ज्यादा सचेत रहने की जरुरत है। उसमें भी अगर आपका जन्म स्वाती नक्षत्र में हुआ है तब तो ये बहुत विनाशकारी है, अतः शान्ति उपाय करने और सावधान रहने की विशेष आवश्यकता है।


          जिन राशियों के लिए अनिष्ट फल कहा गया है, उन्हें ग्रहण नहीं देखना चाहिए ।


 अनिष्टप्रद_ग्रहण_फलों_के निवारण के लिए स्वर्ण निर्मित सर्प कांसे के बर्तन में तील, वस्त्र एवं दक्षिणा के साथ श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान करना चाहिए । अथवा अपनी शक्ति के अनुसार सोने या चाँदी का ग्रहबिम्ब बनाकर ग्रहण जनित अशुभ फल निवारण हेतु दान करना चाहिए। ग्रहण दोष निवारण के लिए विशेषकर गौ, भूमि अथवा सुवर्ण का दान दैवज्ञ के लिए करना चाहिए।

दान करते समय ये श्लोक पढ़ें-

तमोमयमहाभीमसोमसूर्यविमर्दन,
हेमनागप्रदानेनममशान्तिप्रदोभव।
विधुन्तुदनमस्तुभ्यंसिंहाकानन्दनाच्युताम्,
दानेनानेननागस्यरक्षमां वेधनाद्भयात्।।

                       इस प्रकार दान करने से निश्चय ही ग्रहण जनित अशुभ से अशुभ फलों का भी शमन हो जाता है और उसके दुष्प्रभावों  से व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है।


ग्रहण  के समय क्या करें क्या न करें?


1. चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। 

2. श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत को पी लें। ऐसा करने से वे मेधा (धारणाशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाकसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। 

3. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। अतः सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर ( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर ही भोजन करना चाहिए। 

4. ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। इसलिए घर में रखे सभी अनाज और सूखे अथवा कच्चे खाद्य पदार्थों में ग्रहण सुतक से पूर्व ही तुलसी या कुश रख देना चाहिए। जबकि पके हुए अन्न का अवश्य त्याग कर देना चाहिए। उसे किसी पशु या जीव-जन्तु को खिलाकर, पुनः नया भोजन बनाना चाहिए। 

5. ग्रहण वेध के प्रारम्भ होने से पूर्व अर्थात् सूतक काल में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक तो बिलकुल भी अन्न या जल नहीं लेना चाहिए।

6.ग्रहण के समय एकान्त मे नदी के तट पर या तीर्थो मे गंगा आदि पवित्र स्थल मे रहकर जप पाठ सर्वोत्तम माना गया है ।

7. ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल(वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं। ग्रहण समाप्ति के बाद तीर्थ में स्नान का विशेष फल है। ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए। 

8. ग्रहण समाप्ति पर स्नान के पश्चात् ग्रह के सम्पूर्ण बिम्ब का दर्शन करें, प्रणाम करें और अर्ध्य दें।उसके बाद सदक्षिणा अन्नदान अवश्य करें। 

9. ग्रहण समाप्ति स्नान के पश्चात सोना आदि दिव्य धातुओं का दान बहुत फलदायी माना जाता है और कठिन पापों को भी नष्ट कर देता है। इस समय किया गया कोई भी दान अक्षय होकर कई गुना फल प्रदान करता है।

10. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु दान करने से अनेक गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। 

11. ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।

12. ग्रहण काल मे सोना मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन  ये सब कार्य वर्जित हैं।

13. ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। 

14. ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण)

15. गर्भवती महिलाओं तथा नवप्रसुताओं को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। सुतक के समय से ही ग्रहण के यथाशक्ति नियमों का अनुशासन पूर्वक पालन करना चाहिए।उनके लिए बेहतर यही होगा कि घर से बाहर न निकलें और अपने कमरे में एक तुलसी का गमला रखें।

16. ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाएँ श्रीमद्भागवद् पुराणोक्त गर्भरक्षामन्त्र- 

पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते ।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ॥
अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो ।
कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम् ॥

          का अनवरत मन ही मन पाठ करती रहें।

17. भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। इसी प्रकार गंगा स्नान का फल भी चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना  होता है। 

18. ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है। 

19. ग्रहण के दौरान भगवान के विग्रह को स्पर्श न करे।

20. ग्रहण के समय ईष्टमन्त्रों की सरलता से सिद्धि प्राप्त हो जाती है, अतः अपने गुरु से अपने अभिष्ट मन्त्र लेकर उनके सानिध्य में ग्रहण के दौरान मन्त्र-सिद्धि भी कर सकते हैं। शाबर मन्त्र ग्रहण के दौरान गंगातट पर 10,000 जपने से सिद्ध हो जाते हैं।

21. अपने राशि पर पड़ने वाले ग्रहण के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए ग्रहण के दौरान अपने राशिस्वामि का मन्त्र या सूर्य नारायण अथवा चन्द्रदेव के मन्त्र का जप करना बहुत प्रभावी होगा।

 

ग्रहण को कैसे देखें?


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ज्योतिषियों, खगोलशास्त्रियों और वैज्ञानिकों के अलावा सामान्य जनमानस में भी ग्रहण को देखने की विशेष जिज्ञासा रहती है। खासकर छात्रों में यह उत्कण्ठा विशेषरूप से देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कैसे हम 25 अक्टूबर को लगने वाले सूर्यग्रहण का आनन्द ले सकते हैं।

1. ग्रहण को देखने के लिए पर्याप्त नेत्र सुरक्षा का ध्यान रखें साथ ही वैज्ञानिकों के द्वारा निर्देशित सूर्य ग्रहण चश्मा का ही प्रयोग करें ।

2. ग्रहण को कभी भी खुली आंखों से ना देखें ।

3. टकटकी लगाकर ग्रहण न देखें, पलकें झपकातें रहें। 

4. खुले मैदान में साफ आसमान के नीचे खड़े होकर आप ग्रहण देख सकते हैं।

5. गणित ज्योतिष् के अध्येता और एस्ट्रोनामि के विद्यार्थी और खगोल वैज्ञानिक ग्रहण को विशेष तौर पर आब्जर्व करते हैं। 

6. पिन होल कैमरों या अन्य किसी साधन की मदद से किसी परदे पर सूर्य की छाया लेकर आसानी से सूर्यग्रहण देखा जा सकता है | 


- ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य 

श्री ला.ब.शा.विद्यापीठ, दिल्ली ।